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ऑनलाइन मतदान कब !

लखनऊ। एक तरफ देश डिजिटल की ओर दिनो-दिन कदमताल बढ़ा रहा है। आज देश के प्रधानमंत्री के कहने पर लोग डिजिटल ट्रांजेक्शन से लेकर हर सुविधा का इस्तेमाल डिजिटली करने की ओर बढ़ चुके हैं। लेकिन डिजिटल मतदान करने का सपना आज भी अधूरा है और अब लोग इस पर सवाल भी उठाने लगे हैं।

आम जन के कार्यों को दिनो- दिन सरकार ऑनलाइन कर रही है ताकि देश के लोगों को विभागों के भ्रष्टïाचार का सामना न करना पड़े या दलालों के चक्कर में आकर व्यर्थ में समय न नष्टï करना पड़े। ऐसे में सवाल यह उठता है कि देश में लोकतांत्रिक व्यवस्था को ऑनलाइन क्यों नहीं किया जा सकता। ऐसा तब है जब लोगों के सार्वजनिक जीवन का सारा डाटा तक सार्वजनिक हो चुका है। क्या निर्वाचन आयोग इसके लिए तैयार नहीं है? या फिर ऑनलाइन वोटिंग में सेंध लगने के डर के चलते ऐसा करने से कतरा रहा है।

तो हम आपको बताते हैं कि पूरे देश के लिए ऑनलाइन वोटिंग का सपना फिलहाल असंभव क्यों लग रहा है? लेकिन दृढ़ इच्छाशक्ति से इस सपने को पूरा किया जा सकता है। ई-वोटिंग का सबसे कमजोर पहलू यह होगा कि मतदान के समय मतदाता की पहचान नहीं हो पाएगी। दूसरे, यह भी सुनिश्चित नहीं हो पाएगा कि वोटिंग के समय वोटर को प्रभावित नहीं किया जा रहा है। फिर यह संविधान की गुप्त मतदान की अवधारणा के भी विपरीत होगा।

मोबाइल के जरिए मतदान से बोगस वोटिंग की आशंका बढ़ जाएगी। मुमकिन है, एक आदमी कई लोगों के नाम पर मोबाइल वोटिंग का रजिस्ट्रेशन करवा ले। इंटरनेट वोटिंग के लिए यह जरूरी है कि जिस कंप्यूटर के मार्फत रजिस्ट्रेशन कराया गया है, वोटिंग भी उसी से की जाए। यानी एक कंप्यूटर से एक ही वोटर मतदान कर सकेगा। ऐसे में अगर एक घर में छह वोटर होंगे तो सभी के लिए अलग-अलग कंप्यूटर की जरूरत होगी। जिनके पास खुद का कंप्यूटर नहीं होगा, उनके लिए ई-पोलिंग बूथ की व्यवस्था करनी होगी, जो कि एक हास्यास्पद स्थिति होगी क्योंकि जो वोटर ई-पोलिंग बूथ पर जाकर मतदान कर सकता है।

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वह सामान्य पोलिंग बूथ पर भी जा सकता है। इलेक्शन कमिशन ई-वोटिंग की पहल कर भी चुका है, लेकिन अभी यह विधानसभा और लोकसभा चुनावों में लागू नहीं हो पाई है। गुजरात नगरपालिका में 2010 और 2011 में इस माध्यम से मतदान कराया गया था लेकिन इसके बाद यह योजना बहुत आगे नहीं बढ़ पाई। विशेषज्ञों के अनुसार राजनीतिक पार्टियां हैकरों की मदद से इस सिस्टम का दुरुपयोग कर सकती हैं। ऑनलाइन वोटिंग से संबंधित और भी कई तकनीकी समस्याएं हैं, जिनके माकूल समाधान के बिना इसे अमल में लाना संभव नहीं लगता। ऐसे में बाकी सुविधाओं के साथ-साथ वोटिंग को भी ऑनलाइन की लिस्ट में आने में शायद दशकों का समय लगे।

शत- प्रतिशत वोट चाहिए तो ये तरीका अपनाना जरूरी

ऑनलाइन वोटिंग में वोटर आइडेंटिफिकेशन के लिए आधार कार्ड और नेशनल पॉपुलेशन रजिस्टर के डेटा का प्रयोग करके उसे ऑनलाइन लिंक किया जा सकता है। इससे वेरिफिकेशन की प्रक्रिया आसान हो जाएगी। इसमें इंट्री पंचायत, जिला, राज्य या राष्ट्रीय स्तर पर की जाती है। इसमें दर्ज हो जाने के बाद 18 साल से ऊपर के सभी लोगों को स्मार्ट नेशनल आइडेंटिटी दी जाती है।

ऑनलाइन हैकिंग और तकनीकी गड़बड़ी दूर करने के लिए निर्वाचन आयोग लोकसभा क्षेत्रों में अपनी तरफ से अपने ही केंद्रों में ऑनलाइन वोटिंग की सुविधा उपलब्ध करा सकता है, जिससे घर से दूर बैठे लोग अपनी लोकसभा या विधानसभा के लिए वोट कर सकें। अगर घर बैठे ऑनलाइन वोटिंग संभव न हो तो कम से कम ऐसी व्यवस्था तो की ही जा सकती है कि मुंबई में काम करने वाला वहीं मुंबई में अपने लोकसभा क्षेत्र के लिए वोट डाल सके। ऐसे अलग बूथों की व्यवस्था की जा सकती है। शत- प्रतिशत मतदान का लक्ष्य पाने के लिए इस तरह के प्रयोग किए जाने चाहिए।

आसान होगी वोटिंग

  • बैंक खाते की तर्ज पर रजिस्टर्ड नंबर से हो मतदान
    आधार से लिंक मोबाइल नंबर हो मान्य
    आधार और बैंक खाते में दर्ज व्यक्ति के मोबाइल नंबर पर जाए ओटीपी
    ओटीपी डालने के बाद प्रत्याशी को वोट कर पाये मतदाता
    मतदान पूरा होने के बाद मतदाता के पास पहुंचे मैसेज
    मैसेज में हो पूरी डिटेल

बचाव में ये करना जरूरी

  • इसमें बिना आधार और बैंक खाते वाले मोबाइल नंबर अवैध माने जाएं
    बीएलओ को घर- घर भेजकर करवाया जाए सत्यापित
    बिना ओटीपी के वोट न देने का हो नियम
    एक व्यक्ति के पास एक आधार, एक बैंक खाता और एक मोबाइल नंबर होने की हो बाध्यता
    मोबाइल लोकेशन से हो सकेगी ट्रैकिंग
    वैध- अवैध का अंतर जानने के लिए बीएलओ से करवाया जाए सत्यापन

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