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टूट रही बाध करोबार की सांसे

  • डायलिसिस पर है सुलतानपुर का कुटीर उद्योग
  • हुनरमन्द हाथों में बेगारी और बदहाली का कटोरा

badh copyसंतोष यादव

सुलतानपुर। कुश की नगरी सुलतानपुर जिले का बाध उद्योग इन दिनों डायलिसिस पर है। गोमती नदी के तटवर्ती इलाकों में फैला बाध व्यवसाय सुविधाओं के अभाव में दम तोड़ रहा है। जिले के इस कुटीर उद्योग को बढ़ावा देने की ठोस पहल कभी नहीं हुई। आजादी के बाद से अनेक सरकारें आई गई लेकिन इस धंधे में लगे परिवारों के साथ न्याय नहीं कर पाईं सरकारों के उपेक्षापूर्ण रवैये के कारण ही देश के कई राज्यों के लिये निर्यात होने वाले सुलतानपुर के बाध की धमक धीरे-धीरे कम होती जा रही है।

कुटीर उद्योग के रुप में फैला यह व्यवसाय गोमती नदी के किनारे बसे सैकड़ों गावों में रह रहे निषाद मल्लाह आदि पिछड़ी जातियों का यह मुख्य व्यवसाय है। लगभग 20 हजार परिवार इस पेशे से जुड़े हैं जिनके यहां पीढ़ी दर पीढ़ी यह काम होता आ रहा है। इन जातियों से इतर भी निम्न जीवन यापन कर रहे दलित व फकीर भी इस व्यवसाय से जुड़े हैं, लेकिन यह धंधा अब इन परिवारों के लिये घाटे का सौदा साबित हो रहा है। पूरे दिनभर की जी तोड़ मेहनत करने के बाद एक कुनबा दो किलो बाध प्रतिदिन तैयार कर पाता है। फिर भी यह परिवार इस कारोबार में लगे हैं वजह ये पेशा इन परिवारों की मजबूरी भी है। जहां ये बसे हैं वहा बाध बनाने के अलावा कोई और काम भी नहीं है।

बसौढ़ी, केएनआई रतनपुर, टेढुई टाटिया नगर नोने मऊ, कादीपुर, कुड़वार, मुड़ुवा, बेलहरी डड़वा मधुबन अंगनाकोल, छापर, ओदरा, कमनगढ़, साढ़ापुर,वलीपुर, सैदपुर, भोंवे मोलनापुर, सिरवारा, वजूपुर, चन्दौर, अगई, सड़ाव, बरासिंन, भडऱा, चिरावां, पाण्डेबाबा, आमकोल सहित कई दर्जन गावों में बाध तैयार किया जाता है। जनवरी से जून माह तक इसका सीजन होता है। हालांकि हर समय यहां बाध तैयार किया जाता है। लेकिन उस दौरान कच्चेमाल की उपलब्धता अधिक रहने के कारण असली सीजन वही होता है। कास मूंज, कुश, सरपत, भरुई आदि से बाध तैयार कर महिलायें व पुरुष इसे मण्डी पहुंचाते हैं। मंगलवार व शनिवार को यहां बड़ी मण्डी सजती हैं जहां लगभग दस आढतियां हैं जिनके द्वारा यह बाध कानपुर के रास्ते दिल्ली, हरियाना, राजस्थान, मध्य प्रदेश सहित अन्य प्रान्तों को भेजा जाता है।

सालाना इसका कारोबार तीन करोड़ से अधिक है। बावजूद इसके बाध बनाने वालों को कोई फायदा नहीं पहुंच रहा है। उनकी माली हालत दिन ब दिन बद से बदतर होती जा रही है। छापर की सूरसती, ओदरा की उदयराजी, कमनगढ़ की मैनादेवी, साझापुर की संगीता, अर्चना, वलीपुर की दयावती, सैदपुर की मीना, लीलावती कहती हैं कि मुनाफा न होने की वजह से नई पीढ़ी इस पेशे से दूर भाग रही है। उनके अनुसार शासन प्रशासन का भी कोई सहयोग नहीं मिलता है। बाध बरते बरते इनके हाथों की लकीरे मिट गई। वहीं पेशे से जुड़ी दुश्वारियां गहरी होती गईं। इस धंधे में भी पूंजी का खेल हावी है। मेहनतकश अपनी मजदूरी नहीं निकाल पा रहे मुनाफा कमाना तो दूर की बात है।

अब इनके हुनरमन्द हाथों में बेगारी और बदहाली का कटोरा है। समस्याएं पेशे से इतर भी हैं आवास, सड़क, बिजली, पानी, शिक्षा जैसी मूलभूत सुविधाओं से इनकी बस्तियां महरुम है। प्रत्येक चुनाव में आश्वासनों का झुनझुना ही इनके हाथ लगता रहा। जीत हार के साथ आई बात, गई बात हो कर रह जाती है। नतीजा ढाक के तीन पात ही रहा। बाध निर्माण में लगे इन परिवारों की बेबसी का हर किसी दल ने फायदा उठाया सब की नजरों में से भीड़ का हिस्सा ही बने रहे।

47 साल बाद बाध व्यवसाय को मिला ठौर
बाध व्यवसाय के लिये स्थाई मण्डी की तलाश 47 साल बाद पूरी हुई। अर्से से इस मांग को लेकर लड़ाई लड़ रहे लोगों के काले बाल सफेद हो गये। युवावस्था से वृद्धावस्था की ओर पहुंच गये लेकिन इन्हें सुकून इतना ही है कि जीते जी एक लम्बी लड़ाई टीम ने फतह कर ली। गौरतलब है कि 17 जूून 1970 को सुलतानपुर में भारतीय निषाद संघ के बैनर तले निषाद समुदाय के नेता खेमई प्रसाद निषाद की अगुआई में पहला प्रदर्शन हुआ था तब से अनवरत निषाद समुदाय अपनी मांग को लेकर मुखर होता रहा लेकिन बात धरना प्रर्दशन, ज्ञापन, आश्वासन के आगे नहीं बढ़ पाई। बड़े बुजुर्ग बताते है कि लगभग 60 साल पूर्व से ही इलाहाबाद फैजाबाद राष्ट्रीय राजमार्ग पर शाहगंज पुलिस चौकी के निकट का क्षेत्र बाधमण्डी के नाम से जाना जाता रहा है लेकिन ये नाम मात्र की मण्डी रही यहां न कोई टीन शेड है। न बैठने की व्यवस्था न ही अन्य कोई सुविधा। खुले आसमां के नीचे ही जाड़ा, गर्मी, बरसात का दंश बाध व्यवसाई झेलते रहे सारा व्यापार फुटपाथ पर ही होता चला आ रहा है। हालांकि संघर्षो का ही नतीजा रहा कि लोलेपुर, पांचोंपीरन, रैदास मन्दिर के निकट बाध मण्डी बनाने का प्रस्ताव हुआ था लेकिन उपयुक्त स्थान न होने के कारण निषाद समुदाय ने ही इनकार कर दिया।

समाजवादी पार्टी से नगर विधायक रहे अनूप सण्डा के अथक प्रयास बाद जमीन की तलाश भी पूरी हो गई मुख्यालय से एक किमी दूरी पर फैजाबाद मार्ग पर 35 बिस्वा जमीन जिलाधिकारी एस. राजलिंगम एवं तत्कालीन सपा विधायक अनूप सण्डा के प्रयास से बाध मण्डी के लिये उपलब्ध हुई जमीन मिली तो जन प्रतिनिधियों ने भी मदद को हाथ बढ़ाया। अनूप सण्डा ने अपनी विधायक निधि से 22 लाख रुपये राज्यसभा सदस्य व सपा नेता विशम्भर निषाद ने छह लाख रुपये अपनी निधि से दिया। मण्डी का आधारभूत ढांचा तैयार हुआ ही था, इसी बीच स्थानीय सांसद वरुण गांधी की महिला प्रतिनिधि व भाजपा नेता रेखा निषाद की सिफारिश पर सांसद वरुण गांधी ने 46 लाख रुपये बाध मण्डी निर्माण के लिये दिये। जनप्रतिनिधियों द्वारा उपलब्ध कराये गये लगभग 74 लाख रुपये से अधिक धन से बाध पेशे से जुड़े लोगों के सपनों का घर बनने तो लगा है, लेकिन समस्यायें अभी और भी है। जहां धंधे के लिये स्थाई ठौर मिला है। वहीं बाध बनाने में आने वाली चुनौतियों में निपटने की दूर-दूर तक कोई उम्मीद नहीं दिख रही है।

बाध व्यवसाय को कुटीर उद्योग का दर्जा दिया जाय इसे बढ़ावा देने के लिये कम ब्याज पर ऋण और अनुदान दिया जाय। इस धन्धे में लगे परिवारों के उत्थान के लिये योजनायें चलाई जाय। इससे जुड़े लोगों का शोषण रुके और उचित प्रोत्साहन मिले तभी जिले के इस प्रमुख व्यवसाय को जीवित रखा जा सकता है।
खेमई प्रसाद निषाद
प्रदेश अध्यक्ष, कश्यप निषाद सभा उत्तर प्रदेश

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