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दिमागी बुखार, योगी पायेंगे पार

पूर्वांचल में दिमागी बुखार का कहर, योगी सरकार से उम्मीद  
११ वर्ष, ६२८३ बच्चों की मौतें
दिमागी बुखार से बच्चों की कब्रगाह बने गोरखपुर को योगी आदित्यनाथ से उम्मीद
पूर्वांचल में दिमागी बुखार पर काबू पाना  सरकार के लिये बड़ी चुनौती
दिमागी बुखार के इलाज की व्यवस्थ दुरुस्त करें : स्वास्थ्य मंत्री

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शैलेन्द्र यादव
लखनऊ। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद दिमागी बुखार के कहर से कराह रहे पूर्वांचल को इस अभिशाप से मुक्ति मिलने की उम्मीद बढ़ी है। बीते ११ वर्षों के दौरान बच्चों की मौत की कब्रगाह बन चुके गोरखपुर में दिमागी बुखार ने ६,२८३ बच्चों की जानें ली हैं। यह सरकारी आंकड़े हैं, लेकिन हकीकत इससे भी भयावह है। असमय काल के गाल में समाने वाले नौनिहालों की सही संख्या इससे कहीं अधिक है। त्रासदी के इस आंकड़े में उन बच्चों की संख्या दर्ज नहीं हैं जो इलाज के लिये अस्पताल तक पहुंच ही नहीं पाये। मौत का यह सिलसिला अनवरत जारी है। योगी आदित्यनाथ के मुख्यमंत्री बनने के बाद स्थानीय निवासियों को उम्मीद है कि यह सिलसिला अब और आगे नहीं बढ़ेगा।
पूर्वांचल के सात जनपदों गोरखपुर, महराजगंज, कुशीनगर, देवरिया, सिद्धार्थ नगर, संतकबीर नगर और बस्ती में सबसे ज्यादा दिमागी बुखार का प्रकोप है। जानकारों की मानें तो वर्ष 1978 में पहली बार पूर्वांचल में जापानी इंसेफेलाइटिस ने दस्तक दी। तब से सूबे में छह सियासी दलों ने हुकूमत की और 20 मुख्यमंत्री बदल गये लेकिन इस बीमारी का कहर जारी है। इस बीमारी का कोई कारगर तोड़ नहीं निकाला जा सका। दिमागी बुखार के जो आंकड़े सामने आये उसमें गांवों में होने वाली मौतों का कोई रिकार्ड नहीं है। बहुत से बच्चों ने घर पर, रास्ते में, प्राथमिक स्वास्थ्य केन्द्र या नॄसग होम में भी दम तोड़ा, जिसका जिक्र सरकारी आंकड़ों में नहीं होता है।
जानकार बताते हैं कि जापानी इन्सेफलाइटिस से पीडि़त रोगी एक-दो दिन में ही अत्यधिक गभीर हो जाते हैं। मरीजों की मरणासन्न हालत हो जाती है। साल 2012 में 1,527 मामलों में से ५२५ की मौत हो गई। वहीं 2011 में दर्ज 6,297 मामलों में से करीब ६५5 की मौत सामने आई। जबकि वर्ष 2010 में दर्ज 5,149 मामलों में ५४३ बच्चों ने दम तोड़ दिया। योगी सरकार ने कार्यभार संभालते ही दिमागी बुखार से पार पाने की तैयारी करने के निर्देश दिये हैं। चिकित्सा स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह ने बाबा राघवनाथ मेडिकल कालेज गोरखपुर में एक्यूट इंसेफलाइटिस सिंड्रोम एईएस और जापानी इंसेफलाइटिस जेई के रोगियों के इलाज की बेहतर व्यवस्था करने के निर्देश दिये हैं। इसके अलावा मच्छरों के नियंत्रण के लिये फागिंग, कीटनाशकों का छिड़काव, एंटीलार्वा स्प्रे और बच्चों को शत-प्रतिशत टीकाकरण करने और ब्लाक स्तरीय इंसेफलाइटिस ट्रीटमेंट सेंटर पर चिकित्सकों एवं पैरामेडिकल कॢमयों की उपस्थिति अनिवार्य कर दी गई है।
दिमागी बुखार से लगभग 31 साल में दस हजार से अधिक बच्चों की असमय जीवनलीला समाप्त हो चुकी है और इसके कई गुना बच्चे जीवन भर के लिए अपाहिज हो गये हैं। इसके लिए जेई वायरस को जिम्मेदार माना जाता है, लेकिन इसके साथ कुछ और भी वायरस पूर्वी उत्तर प्रदेश के जनपदों में सक्रिय बताये जाते हैं। मगर, उन सबकी पहचान अभी अधर में है। टीका बनाना और इलाज होना तो दूर की बात है। मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को भी स्थिति की गंभीरता का बखूबी अंदाजा है। इसलिये वह दिमागी बुखार के प्रकोप से पूर्वांचल को निजात दिलाने के लिये हर संभव प्रयास करने को तत्पर हैं।

मंत्री समूह हुआ गठित, कार्रवार्ई का पता नहीं
जानकारों की मानें तो साल 2011 में कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने तत्कालीन केन्द्रीय स्वास्थ्य मंत्री गुलाम नवी आजाद को गोरखपुर का दौरा करने के लिए कहा। इसके बाद केन्द्र सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए एक मंत्री समूह का गठन किया। लेकिन, कार्यवाई क्या हुई इसका जनता को आज भी इंतजार है। केन्द्र सरकार ने इस महामारी से निपटने के लिए पांच हजार करोड़ रुपये की घोषणा तो जरूर की मगर जमीनी स्तर पर इससे कोई खास बदलाव नहीं आया।

बिस्तर, डॉक्टरों की कमी से हालात हुये गंभीर
गोरखपुर के बीआरडी मेडिकल अस्पताल में इस बीमारी से निपटने के लिए खासतौर पर 100 बिस्तर का एक वार्ड बनाया गया। पर, बिस्तर और डॉक्टरों की कमी ने हालात को और गंभीर बना दिया। देश में इंसेफलाइटिस से पार पाने के लिए एक टीका भी बनाया गया। लेकिन इस टीके से महज 12-13 फीसदी बच्चों को ही फायदा होने का अनुमान है। क्योंकि ये सिर्फ जापानी इंसेफलाइटिस का उपचार कर सकता है।

छिड़काव की नहीं मिली अनुमति
बीते तीन दशकों से कहर बरपा रहे जापानी इंसेफलाइटिस यानी दिमागी बुखार की रोकथाम के लिये तत्कालीन केन्द्र सरकार ने वर्ष 20०५ में इस वायरस पर काबू पाने के लिये प्रभावित क्षेत्रों में कीटनाशकों का छिड़काव, एंटीलार्वा स्प्रे कराने के लिये दो हेलीकाप्टर उत्तर प्रदेश भेजे। लेकिन तत्कालीन मुलायम सरकार ने छिड़काव कराने से यह कहते हुये मना कर दिया कि इससे जानवरों और फसलों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा। यह हेलीकाप्टर कई दिनों तक रायबरेली के फुरसतगंज में खड़े रहे और राज्य सरकार की अनुमति न मिलने पर वापस दिल्ली को उड़ गये।

कई बार जारी हुआ हाई अलर्ट
वर्ष २०१२ में झांसी, चित्रकूट तथा बस्ती मंडलों के 12 जिलों में हाई अलर्ट जारी करते हुए चिकित्सा व्यवस्था चाक-चौबंद करने के निर्देश दिये गये। चारों मंडलों के जिलों गोरखपुर, कुशीनगर, महराजगंज, देवरिया, बस्ती, संत कबीर नगर, सिद्धार्थनगर, झांसी, ललितपुर, जालौन, चित्रकूट और बांदा के मुख्य चिकित्साधिकारियों तथा चिकित्सा अधीक्षकों को अस्पतालों की व्यवस्था को फौरन दुरूस्त करने के आदेश दिये गये हैं। बावजूद इसके हालात में कोई प्रभावी सुधार नहीं हुआ।

वर्ष         मौते
२००५     ११३५
२००६     ४३४
२००७    ५४७
२००८    ५१५
२००९    ५६५
२०१०     ५४३
२०११     ६५५
२०१२     ५२५
२०१३     ६०९
२०१४     ५८०
२०१५      ५९१
२०१६      १७५ अगस्त तक

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