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…सिसकते आसुओं का कारवां रह जाएगा

  • थम नहीं रहा समाजवादियों का चि_ïी वॉर, अब दीपक मिश्र ने सपा महासचिव पर लगाये गम्भीर आरोप
  • इतिहास रामगोपाल यादव को समाजवादी विचारधारा को सबसे अधिक नुकसान पहुंचाने वाले व्यक्ति के रूप में रेखांकित करेगा : दीपक मिश्र

ramgopal copyआईना जब कभी भी उठाया करें।

पहले देखा करें फिर दिखाया करें।।

लखनऊ। समाजवादी पार्टी में रार बरकरार है। विधान सभा चुनाव से पूर्व शुरू हुआ चि_ïी वॉर थमने का नाम नहीं ले रहा। चुनाव में अपने-अपने प्रत्याशियों की सूची जारी करने के साथ चरम पर पहुंचा यह युद्ध सपा का पर्याय निवर्तमान राष्टï्रीय अध्यक्ष को पद से हटाने और पार्टी की प्राणवायु कहे जाने वाले शिवपाल सिंह यादव को हाशिये पर डालने तक सुनियोजित रूट से चलता रहा। विधान सभा चुनाव में पार्टी की करारी हार हुई। बावजूद इसके संगठित होने के बजाय विघटन जारी है। अब समाजवादी पार्टी प्रबुद्ध प्रकोष्ठ के राष्ट्रीय अध्यक्ष दीपक मिश्र ने अपने निष्कासन के बाद सपा महासचिव रामगोपाल यादव पर कई संजीदा आरोप लगाये हैं। इससे पूर्व दीपक मिश्र वर्तमान सपा राष्टï्रीय अध्यक्ष अखिलेश यादव को भी पत्र लिख पार्टी से निकाले जाने का कारण पूछ चुके हैं।

सपा राष्टï्रीय महासचिव राम गोपाल यादव को लिखे पत्र में दीपक मिश्र ने लिखा है, मुझे पार्टी से असंवैधानिक, अलोकतांत्रिक, अनैतिक और अतिरंजित कार्यवाही करते हुए निकाला गया, जितनी पीड़ा तब पहुंची उससे अधिक कष्ट उस समय हुआ जब आपने एक साक्षात्कार में कहा कि आप मुझे नहीं जानते। ऐसा प्रतीत होता है कि आप या तो स्मृतिलोप अथवा मतिभ्रम विकार से ग्रस्त हो चुके हैं या फिर जानबूझ कर सच नहीं बोल रहे हैं। मैं आपका बेहद सम्मान करता हूं इसलिए आपको झूठा नहीं कह सकता। विधाता भी चाहे तो इतिहास नहीं बदल सकता। इतिहास को नकारने की क्षमता ईश्वर ने अभी तक किसी को नहीं दी।

छोटे लोहिया जनेश्वर मिश्र ने आपसे मेरा परिचय कराते हुए मुझे संरक्षित रखने को कहा था। आपने मेरा ख्याल समाजवादी पार्टी की तरह रखा, दोनों जद्दोजहद करते रहे और आपने अपने वातानुकूलित कक्ष व कार से बाहर तक नहीं देखा। आपने न केवल मुझे अपितु छोटे लोहिया जनेश्वर जी के वचनों को भी नकारते हुए लांछित किया है। आप स्मृतिलोप से ग्रस्त हैं या मिथ्यावादी हैं, आप जानें। किन्तु दोनों ही परिस्थितियों में समाजवादी पार्टी एवं भाई अखिलेश का भविष्य चौपट होना तय है। पत्र में आगे लिखा है, जब आपने बाबू मोहन सिंह को अपमानित किया, तब उन्होंने मर्माहत होकर कहा था कि आपको समाजवाद से कोई सरोकार नहीं हैं। जिस दिन नेताजी कमजोर पड़ेंगे, आप उन्हें छोड़ देंगे। आप के समाजवादी सरोकारों पर टिप्पणी करना मुझे उचित नहीं। किन्तु प्रत्यक्षम् किम् प्रमाणम्। मोहनजी की आशंका सही साबित हुई और नेताजी जैसे ही कमजोर हुये, आपने उन्हें छोड़ दिया।

पांच मई को एक टीवी डिबेट में मैंने भ्रष्टाचार के प्रतीक पुरुष यादव सिंह को बचाने वाले परसेप्शन को आत्मघाती बताया, मेरे साथ बैठे एक अन्य दल के प्रवक्ता ने कहा कि अब रामगोपाल जी आपको पार्टी से निकाल देंगे। मैंने प्रतिवाद किया कि वह समाजवादी हैं, उनका यादव सिंह से क्या कनेक्शन। पर, सात मई को मुझे वास्तव में सपा से बिना कारण बताए निकाल दिया गया। लोहिया की कसौटी पर किसी ईमानदार प्रतिबद्ध राजनीतिक कार्यकर्ता के बारे में आप जैसे बड़े पद पर काबिज व्यक्ति का अपमानकारी भावभंगिमा में ऐसे शब्द बोलना गलती नहीं पाप की श्रेणी में आता है। मैं आपका सम्मान करता हूं कि इसलिए कदापि नहीं कहूंगा कि आप नेताजी के भाई न होते तो कभी स्वयं को समाजवादी नहीं कहते। मैं मनसा-वाचा-कर्मणा समाजवादी था, हूं और रहूंगा।

जब से आप दल में ताकतवर हुए हैं, दल विचारधारा एवं विस्तार के दृष्टिकोण से संकुचित होता गया है। लोग कहते हैं कि आप कार्यकर्ताओं को कीड़ा-मकोड़ा समझते हैं, गिरोहबंदी कर पार्टी को कमजोर कर रहे हैं। मैंने लगातार समाजवादी पार्टी का प्रचार किया, वोट भी दिया है और दिलवाया भी। किसी पार्टी-प्रत्याशी को हराने के लिए धन की पोटली नहीं खोली जैसा कि कुछ लोगों ने जसवंतनगर में किया। पत्र में आगे लिखा है, क्या आपने जसवंतनगर चुनाव में समाजवादी पार्टी के अधिकृत प्रत्याशी शिवपाल सिंह यादव को वोट दिया है? जवाब आप दें न दें, सबको पता है। जहां तक मेरी जानकारी है कि सैफई बूथ जहां के आप मतदाता हैं, दो मत नोटा में पड़े। इसमें से एक वोट आपका था। आपकी एक उंगली मेरी तरफ है तो बाकी तीन…।

आप ने आम कार्यकर्ताओं को कहां-कहां अपमानित किया है और समाजवादी वैचारिकी व पार्टी को किस तरह नुकसान पहुंचाया यह ज्ञात है। दीपक ने आगे निवेदन पूर्वक लिखा है सार्वजनिक रूप से ऐसी झूठी बातें कह कर आप अपनी ही गरिमा का अवमूल्यन न करें। आप नेताजी के भाई हैं इसलिए यह नहीं कहूंगा कि एक गिरोह बनाकर आप भाई अखिलेश को दल के वफादारों व समाजवादियों से दूर करते जा रहे हैं जिसकी परिणति लगातार पराजयों के रूप में सामने आ रही है। वर्ष 1952 से आज तक कभी भी समाजवादी विचारधारा साख के संकट से नहीं गुजरी। दुर्भाग्यपूर्ण है कि अब ऐसा हो रहा है और वह भी तब जब आप सबसे महत्वपूर्ण पद पर विराजमान है।

आग लेकर हाथ में तू जलाता है किसे
जब न ये बस्ती रहेगी तू कहां रह जाएगा।
प्यार की धरती अगर नफरतों में बांटी गई
रोशनी के शहर में सिर्फ धुआं रह जाएगा
बस सिसकते आसुओं का कारवां रह जाएगा।।

आपने कलंकित की समाजवादी रवायत
दीपक ने अपने पत्र में लिखा है, आप हम सभी का जितना चाहें अपमान करें किन्तु नेताजी का अपमान करना बंद कर दें। आपने मुझे प्रबुद्ध प्रकोष्ठ का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया था, फिर आपने विंग भंग कर दी। मैंने एक शब्द नहीं बोला। लेकिन नेताजी ने कारण स्पष्ट करते हुए जब आपको हटाया तो उनके विरुद्ध प्रतिकूल टिप्पणियां करने लगे। आपने बड़ों का सम्मान करने की समाजवादी रवायत को कलंकित कर दिया किन्तु मैं ऐसा नहीं करुंगा क्योंकि आप बड़े हैं और मैं आपका सम्मान करता हूं। आप जितने वफादार नेताजी के प्रतीत होते थे उतने ही भाई अखिलेश के भी दिख रहे हैं। उम्मीद है कि जो आपने नेताजी के साथ किया वो अखिलेश जी के साथ नहीं करेंगे।

…जो आरजी के वही सही
जब 2012 में समाजवादी पार्टी की सरकार बनी, नेताजी ने सभी युवा संगठनों को बहाल किया। युवाओं ने मिठाइयां बांटी। पर, लड्डïू गले से पेट तक नहीं पहुंचा आपने सबको भंग कर दिया। चालाकी पूर्वक यह संदेश दिया कि न खाता न बही जो आरजी कहें सही। आपने अपने पैरों से लाखों युवाओं का राजनीतिक भविष्य ही नहीं नेताजी व भाई अखिलेश के इकबाल को भी बार-बार रौंदा है। जब मुख्यमंत्री ने एक एसडीएम को निलंबित किया तो आपने निलंबन पर उनकी कार्रवाई पर सवाल खड़े करते हुए नोएडा के अधिकारी का साथ दिया। परिणाम स्वरूप एसडीएम की बर्खास्तगी पर इतनी चर्चा हुई और तत्कालीन मुख्यमंत्री का रसूख कम हुआ। आपका नोएडा, गाजियाबाद प्रेम जगजाहिर है क्यों है यह अगले पत्र में लिखूंगा।

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