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	<title>Business Link &#187; संपादकीय</title>
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		<title>यादों में अनकही बात</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Jul 2020 09:01:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
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		<category><![CDATA[मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ]]></category>

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		<description><![CDATA[डॉ दिलीप अग्निहोत्री आदरणीय लाल जी टण्डन अब हमारे बीच नहीं है। उन्होंने अपनी पुस्तक अनकहा लखनऊ में अनेक तथ्य उजागर किये थे। मिलनसार होना लखनऊ के चिर परिचित मिजाज रहा है। लाल जी टण्डन की जीवन शैली इसी के अनुरूप थी। तरुण अवस्था में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। यहीं से उनका &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डॉ दिलीप अग्निहोत्री</strong></p>
<p>आदरणीय लाल जी टण्डन अब हमारे बीच नहीं है। उन्होंने अपनी पुस्तक अनकहा लखनऊ में अनेक तथ्य उजागर किये थे। मिलनसार होना लखनऊ के चिर परिचित मिजाज रहा है। लाल जी टण्डन की जीवन शैली इसी के अनुरूप थी। तरुण अवस्था में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। यहीं से उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ था। इसके बाद समाज के बीच रहना, हमेशा लोगों से मिलना जुलना,सभी के सुख दुख में सहभागी होना उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया। उन्होंने समाज जीवन में अनेक उतार चढ़ाव देखे, पार्षद से लेकर सांसद, मंत्री, राज्यपाल तक हुए, लेकिन उनके मूल स्वभाव में कभी परिवर्तन नहीं हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी को राजनीति में अजातशत्रु कहा जाता है। लाल जी टण्डन उनके अनुज की तरह थे। अटल जी की तरह उन्हें भी यही पहचान मिली। राजनीति में मतभेद खूब रहा। लेकिन उन्होंने भी अटल जी की तरह मनभेद पर विश्वास नहीं किया। वैचारिक प्रतिबद्धता सदैव रही,कभी उससे विचलित नहीं हुए।</p>
<p>एक बार लखनऊ राजभवन में उनसे मुलाकात हुई। वही उनकी चिरपरिचित सहजता। तब वह चुनावी राजनीति से अलग हो चुके थे। लखनऊ से उन्होंने दुबारा लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। मैंने आदरणीय टण्डन जी से कहा कि आप इस समय राजभवन में आये है,मेरी अभिलाषा है कि आप राजभवन में रहें। वह मुस्कराये, बोले क्या मतलब। उन्होंने मेरे कथन पर क्या सोचा होगा, मैं नहीं जानता। मैनें कहा कि आप भी राज्यपाल बनें। उन्होंने जो कहा उससे उनके राजनीतिक सिद्धान्त व वैचारिक निष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि राजनीति में पहले दिन से लेकर आज तक मैनें अपने लिए कुछ नहीं मांगा। किसी पद की अभिलाषा नहीं की,अपने बारे में स्वयं कोई निर्णय नहीं लिया। जो पार्टी का आदेश हुआ,उस पर अमल किया। यह सुखद संयोग था कि इसके कुछ समय बाद वह बिहार के राज्यपाल बनाये गए। इसके पहले संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप भाजपा से त्यागपत्र दे दिया था। इसके बाद उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल नामित किया गया था। दोनों प्रदेशों में उन्होंने संविधान के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वहां के लोगों से संवाद बनाये रखा। सीमित समय में ही बिहार और मध्यप्रदेश में आमजन के बीच रहने वाले राज्यपाल की उनकी छवि बनी थी। वैचारिक निष्ठा के उनके कथन का एक संस्मरण याद आया।</p>
<p>टण्डन जी लखनऊ में पत्रकारों को चाट की दावत पर आमंत्रित करते थे। यह उनका नियम बन गया था। इसमें बड़ी सहजता से वह सभी पत्रकारों से मिलते,बात करते थे। एक बार राजकुमार प्लाजा के सामने स्थित उनके सरकारी आवास पर ऐसी ही चाट पार्टी थी। राजनीति की हल्की फुलकी बात भी चल रही थी। एक प्रश्न के जबाब में टण्डन जी ने आवास के बगल में स्थित ऊंची दीवार की ओर इशारा किया। कहा कि पार्टी आदेश करे तो मैं इस दीवार से भी कूद जाऊ। उनकी बात पर ठहाका लगा। लेकिन यह उनकी वैचारिक निष्ठा को उजागर करने वाला प्रतीक था। जब वह भारतीय जनसंघ के सदस्य बने, तब संघर्ष का दौर था। यह माना जाता था कि कांग्रेस के व्यापक प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता। जनसंघ की स्थापना सत्ता के लिए नहीं हुई है।</p>
<p>इसलिए पद नहीं सेवा की प्रेरणा वाले ही इसके सदस्य बनते है। टण्डन जी भी उन्हीं में एक थे। परिवार व व्यवसाय से अधिक ध्यान वह समाज सेवा में लगाते थे। पार्टी के आदेश पर वह पूरी क्षमता से अमल करते थे। बसपा से गठबंधन का निर्णय भी उनका नहीं था। लेकिन जब दायित्व मिला तो वही उसके शिल्पी थे। आदरणीय लाल जी टण्डन के समाज जीव की शुरुआत सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस से हुई थी। उन्नीस सौ साठ में वह सक्रिय राजनीति में आये। दो बार पार्षद और दो बार विधान परिषद सदस्य रहे। तीन बार विधानसभा और एक बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। कल्याण सिंह, बसपा गठबन्धन और राजनाथ सिंह सरकार में वह कैबिनेट मंत्री रहे। इसके अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद लखनऊ लोकसभा सीट खाली हुई थी। उनके लखनऊ से उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था। वह भारी बहुमत से विजयी हुए थे। वह अटल जी को अपना भाई,पिता,मित्र मानते थे। सादर नमन !</p>
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		<title>विश्वविद्यालयों में सांप्रदायिकता का जहर</title>
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		<pubDate>Fri, 24 Mar 2017 11:38:48 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[विचार मंच]]></category>
		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>

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		<description><![CDATA[राम पुनियानी राष्ट्र-विरोधी विचारों को प्रोत्साहन न दें विश्वविद्यालय वे स्थान होते हैं जहां आने वाली पीढ़ी के विचारों को आकार दिया जाता है। विश्वविद्यालयों में स्वस्थ व स्वतंत्र बहस और विभिन्न विचारों, जातियों और धर्मों के विद्यार्थियों के परस्पर मेलजोल से मानवीय और समावेशी मूल्यों का निर्माण होता है। युवा अक्सर आदर्शवादी हुआ करते &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="text-align: left"><strong>राम पुनियानी<br />
राष्ट्र-विरोधी विचारों को प्रोत्साहन न दें<img class="  wp-image-948 alignright" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2017/03/राम-पुनियानी429453jnumarchpti-300x219.jpg" alt="राम-पुनियानी429453jnumarchpti" width="359" height="262" /></strong><br />
विश्वविद्यालय वे स्थान होते हैं जहां आने वाली पीढ़ी के विचारों को आकार दिया जाता है। विश्वविद्यालयों में स्वस्थ व स्वतंत्र बहस और विभिन्न विचारों, जातियों और धर्मों के विद्यार्थियों के परस्पर मेलजोल से मानवीय और समावेशी मूल्यों का निर्माण होता है। युवा अक्सर आदर्शवादी हुआ करते हैं और विश्वविद्यालय का वातावरण, उनके आदर्शवाद को जिंदा रखने में सहायक होना चाहिए। पिछले कुछ वर्षों से देश में विश्वविद्यालयों के वातावरण को संकीर्ण और विषाक्त करने की कोशिशें हो रही हैं। एक ओर स्वस्थ और स्वतंत्र बहस को रोका जा रहा है तो दूसरी ओर किसी न किसी बहाने उदारवादी-प्रजातांत्रिक विचारों और उनके पोषकों पर हमले हो रहे हैं। दिल्ली के रामजस कॉलेज में 22 फरवरी, 2017 के बाद से जो हुआ, वह दक्षिणपंथी राजनीतिक ताकतों की योजनाओं और इरादों की ओर संकेत करता है।<br />
कॉलेज में एक सेमीनार का आयोजन किया गया था। इसके वक्ताओं में उमर खालिद और शहला रशीद शामिल थे। यह आरोप लगाया गया कि ये दोनों राष्ट्र-विरोधी हैं, सेमीनार के आयोजन में बाधा डाली गई और जिन विद्यार्थियों व अध्यापकों ने उसका आयोजन किया था, उन पर यह आरोप लगाकर हमले किए गए कि वे राष्ट्र-विरोधी विचारों को प्रोत्साहन दे रहे हैं। हमलावर आरएसएस की विद्यार्थी शाखा एबीवीपी के सदस्य थे। हमले के अगले दिन, उन्होंने अध्यापकों और विद्यार्थियों को लगभग बंधक बना लिया और उन्हें एफआईआर करने के लिए थाने तक नहीं जाने दिया गया। दो अध्यापकों की खुलेआम पिटाई लगाई गई। इसके बाद एक तिरंगा यात्रा निकाली गई। इसके अगले दिन एक विशाल ‘डीयू बचाओ’ यात्रा निकली, जिसमें हज़ारों विद्यार्थियों और अध्यापकों ने भाग लिया। इससे यह पता चलता है कि एबीवीपी की इन हरकतों के खिलाफ किस तरह का आक्रोश है। दिल्ली विश्वविद्यालय के रामजस कॉलेज में हुई यह घटना एबीवीपी द्वारा विभिन्न उच्च शैक्षणिक संस्थानों के परिसरों में किए जा रहे उत्पातों की श्रृंखला में सबसे ताज़ा है। हैदराबाद केन्द्रीय विश्वविद्यालय में इस बहाने हिंसा की गई कि वहां जातिवादी और राष्ट्रविरोधी गतिविधियां की जा रही हैं। किन गतिविधियों को राष्ट्र-विरोधी बताया गया? विश्वविद्यालय में अंबेडकर स्टूडेन्ट्स एसोसिएशन ने मुजफ़्फरनगर दंगों पर आधारित फिल्म ‘मुजफ़्फरनगर बाकी है’ के प्रदर्शन का आयोजन किया था। इसी संगठन ने याकूब मेमन के संदर्भ में यह मांग की थी कि मौत की सज़ा समाप्त की जाए और ‘पवित्र गाय’ ब्रिगेडों के शिकार बन रहे लोगों के साथ एकजुटता दिखाने के लिए ‘बीफ फेस्टिवल’ का आयोजन किया गया था। हम सब जानते हैं कि उसके बाद किस तरह रोहित वेम्युला की संस्थागत हत्या हुई। इसकी पूरे देश में कड़ी प्रतिक्रिया हुई और विश्वविद्यालयों की स्वायत्तता व दलित मुद्दों को लेकर बहस छिड़ गई।<br />
राष्ट्र-विरोध का मुद्दा कैसे खड़ा किया जाता है, यह जेएनयू और दिल्ली विश्वविद्यालय में हुईं घटनाओं को एक साथ देखकर लगाया जा सकता है। जेएनयू में कुछ नकाबपोशों ने कुछ आपत्तिजनक नारे लगाए। इसके बाद कन्हैया कुमार, उमर खालिद और उनके कुछ साथियों को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया। दिलचस्प यह है कि जिस सीडी को बार-बार एक टीवी चैनल में दिखाया गया और जिसने भावनाओं को भडक़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की, वह सीडी बाद में नकली पाई गई। जहां कन्हैया कुमार और उनके साथियों को गिरफ्तार कर लिया गया वहीं नकाबपोशों को ढूंढने का कोई प्रयास नहीं हुआ। बाद में एक अदालत ने कन्हैया कुमार और उनके साथियों को ज़मानत पर रिहा कर दिया। हाल में दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने यह आरोप लगाया कि भाजपा और एबीवीपी के कार्यकर्ता स्वयं ही आपत्तिजनक नारे लगाकर भाग जाते हैं और फिर उन नारों के बहाने हमले किए जाते हैं। भाजपा के प्रवक्ताओं ने बार-बार यह कहा कि जेएनयू में विद्यार्थी भारत की बर्बादी के नारे लगा रहे थे। इस घटना को लगभग एक साल हो गया है परंतु आज तक यह साफ नहीं है कि वहां पर असल में हुआ क्या था।<br />
रामजस कॉलेज का मुद्दा भी उमर खालिद से जुड़ा हुआ है। उमर खालिद के कश्मीर के मुद्दे पर अपने विचार हैं जो उन लोगों से मेल नहीं खाते, जिन्होंने उन पर हमला किया। प्रश्न यह है कि क्या हमें अपने विचार प्रस्तुत करने की आज़ादी भी नहीं है? कश्मीर के मामले में भाजपा की यह असहिष्णुता इसलिए भी चकित कर देने वाली है क्योंकि भाजपा ने कश्मीर में पीडीपी के साथ मिलकर गठबंधन सरकार बनाई है। पीडीपी का अलगाववादियों के प्रति नरम रवैया रहा है। यह साफ है कि आरएसएस एक ओर विश्वविद्यालय परिसरों में सांप्रदायिक सोच को हवा देना चाहता है तो दूसरी ओर वह अपने से भिन्न राय रखने वालों को आतंकित करना भी चाहता है।<br />
मोदी सरकार के सत्ता में आने के बाद से एबीवीपी की हिम्मत बहुत बढ़ गई है। वह इसलिए खुलेआम हिंसा कर रही है क्योंकि उसे पता है कि उसका कोई कुछ नहीं बिगाड़ सकता। एक के बाद एक विश्वविद्यालयों को निशाना बनाया जा रहा है। जोधपुर के जयनारायण व्यास विश्वविद्यालय का मामला भी ता•ाा है। वहां के प्रोफेसर राणावत ने जेएनयू की प्रोफेसर निवेदिता मेनन को एक गोष्ठी को संबोधित करने के लिए आमंत्रित किया था। इस गोष्ठी के बाद वक्ता के विरूद्ध प्रकरण दर्ज कर लिया गया और प्रोफेसर राणावत को निलंबित कर दिया गया।  यह सब बहुत दुखद और चिंतित करने वाला घटनाक्रम है। भविष्य में हम क्या आशा कर सकते हैं?<br />
रोहित वेम्युला की मृत्यु के बाद देश भर में विद्यार्थी आंदोलनरत हो गए थे और दलितों से जुड़े मुद्दे चर्चा में आ गए थे। रामजस कॉलेज में भी जहां एबीवीपी की तिरंगा यात्रा में बहुत कम विद्यार्थियों ने भाग लिया वहीं डीयू बचाओ यात्रा को जबरदस्त समर्थन मिला। रामजस कॉलेज की विद्यार्थी गुरमेहर कौर को ‘ट्राल’ किया गया। उन्होंने एक फेसबुक पोस्ट पर लिखा कि वे एबीवीपी से नहीं डरतीं और शांति की पैरोकार हैं। इसके बाद भाजपा नेताओं ने उस पर हमला बोल दिया। इससे विद्यार्थियों में नारा•ागी और बढ़ी और अब विश्वविद्यालय प्रांगणों में खुली बहस के पक्ष में विद्यार्थियों में जनमत बन रहा है। जहां एबीवीपी हिंसा के •ारिए मतभेदों को सुलझाना चाहती है वहीं अधिकांश विद्यार्थी विचार-विनिमय और बहस के पक्ष में हैं। राष्ट्र-विरोध और राष्ट्रद्रोह के नाम पर विद्यार्थियों को डराने-धमकाने का सिलसिला लंबे समय तक नहीं चल सकेगा। खुली और स्वतंत्र बहस के पक्ष में राय को बहुत दिनों तक दबाना संभव नहीं होगा।</p>
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		<title>बसाहट में वन्य जीवों की आहट</title>
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		<pubDate>Fri, 24 Mar 2017 11:34:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[विचार मंच]]></category>
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		<description><![CDATA[(शरद खरे) आबादी का दबाव किस कदर तेजी से बढ़ रहा है.. इसबात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कभी आप इंटरनेट की सहायता से गूगल मैप से किसी भी शहर या सिवनी को देखें तो आपको शहर के आसपास नयी बसाहट आसानी से दिखायी दे जायेंगी। यही आलम ग्रामीण अंचलों का है। &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>(शरद खरे)<img class=" size-medium wp-image-944 aligncenter" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2017/03/Wildlife-and-its-Conservation-in-India-300x167.jpg" alt="Wildlife-and-its-Conservation-in-India" width="300" height="167" /></p>
<p>आबादी का दबाव किस कदर तेजी से बढ़ रहा है.. इसबात का अंदाजा सहज ही लगाया जा सकता है। कभी आप इंटरनेट की सहायता से गूगल मैप से किसी भी शहर या सिवनी को देखें तो आपको शहर के आसपास नयी बसाहट आसानी से दिखायी दे जायेंगी। यही आलम ग्रामीण अंचलों का है।<br />
जंगलों के आसपास ग्रामीणों के द्वारा बसाहट के जरिये वन्य जीवों के प्राकृतिक रिहाईश वाले क्षेत्रों को कम किया जा रहा है। सिवनी शहर से महज तीन-चार किलोमीटर दूर ही काले हिरणों के झुण्ड आसानी से देखे जा सकते हैं। शहर में ज्यारत नाके से भैरोगंज होकर नागपुर मार्ग के लगभग पांच किलोमीटर की परिधि में दक्षिण की ओर इन हिरणों की भरमार है।</p>
<p>अरी क्षेत्र के आसपास लगभग एक-डेढ़ माह से एक बाघ ने कोहराम मचा रखा था। आधा दर्जन मवेशियों को यह अपना ग्रास बना चुका था। वन विभाग के दल को भी इसे पकड़ने में भारी मशक्कत करनी पड़ी। बमुश्किल पकड़ाये बाघ को सीधी भेज दिया गया। इसके साथ ही ग्रामीण उग्र हो गये। ग्रामीणों का गुस्सा लाजिमी था। जब तक उन्हें यह बात पुख्ता तौर पर पता न चल जाये कि बाघ को पकड़ लिया गया है, उनका डर कैसे दूर होता!</p>
<p>सवाल यह उठता है कि आखिर वन्य जीव अपने प्राकृतिक आवास को छोड़कर आबादी की ओर रूख क्यों कर रहे हैं? इस बारे में वन विभाग के आला अधिकारियों को शोध करने की आवश्यकता है। सिवनी जिले में अचानक ही ऐसा क्या हो गया है कि वन्य जीव विशेषकर बाघ जैसा खूंखार जानवर गांवों की ओर रूख करने पर मजबूर हो रहा है।</p>
<p>बाघ के बारे में यही कहा जाता है कि नर बाघ व्यस्क होते ही अपना क्षेत्र निर्धारित कर लेता है। इसके क्षेत्र में मादा बाघ तो घूम सकतीं हैं पर दूसरा वयस्क नर बाघ अगर इसके क्षेत्र में प्रवेश करता है तो इनके बीच वर्चस्व की जंग आरंभ हो जाती है। जो जीता वो सिकंदर की तर्ज पर जीतने वाला ही उस क्षेत्र का राजा होता है। वर्चस्व की इस जंग में बाघों की जान जाने के अनेक उदाहरण भी मौजूद हैं।</p>
<p>अगर बाघ जंगल से निकलकर बाहर आ रहा है तो या तो वह भोजन की तलाश में है या फिर अपने क्षेत्र निर्धारण के लिये ऐसा कर रहा है। कहते हैं पेंच नेशनल पार्क में नर शावकों की तादाद भी ज्यादा हो चुकी है। वन विभाग के अधिकारियों को चाहिये कि अभी से इसके लिये कार्ययोजना तैयार कर ली जाये, वरना आने वाले समय में वर्चस्व की जंग में और बाघ काल-कलवित हो जायें तो किसी को आश्चर्य नहीं होना चाहिये।</p>
<p>अगर पेंच क्षेत्र में बाघों की तादाद कम है तो फिर टी-22 को पेंच की बजाय संजय नेशनल पार्क सीधी भेजने का क्या औचित्य है? जाहिर है सिवनी में जंगल के इलाकों से ज्यादा तादाद में बाघ हो चुके हैं। वनाधिकारी अपने-अपने स्तर पर सिर जोड़कर इस समस्या के निदान के लिये जुटे ही होंगे। संवेदनशील कलेक्टर धनराजू एस. एवं सांसद विधायकों से भी जनापेक्षा है कि जंगली जीवांें के स्वच्छंद जीवन जीने के मार्ग प्रशस्त करने में वे भी महती भूमिका अदा करें।</p>
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