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	<title>Business Link &#187; विचार मंच</title>
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		<title>यूपी बने भोजपुरी फिल्म उद्योग का केंद्र</title>
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		<pubDate>Sat, 19 Sep 2020 12:21:13 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[तेलगू फिल्मों का केंद्र तेलंगाना, तमिल फिल्मों का केंद्र तमिलनाडु, मलयाली फिल्मों का केंद्र केरला तो बंगाली फिल्मों का केंद्र कोलकाता है। भाषा आधारित इन फिल्मों और इस पर आधारित फिल्म उद्योग का केंद्र वही राज्य है जहाँ इनकी राज्य की आधिकारिक भाषा वही भाषा है जो वहां की फिल्मों का भाषा है। सिर्फ हिंदी &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_21888" style="width: 135px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/08/pankaj-sir-copy.jpg"><img class="  wp-image-21888" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/08/pankaj-sir-copy.jpg" alt="pankaj sir copy" width="135" height="141" /></a><figcaption class="wp-caption-text">पंकज जायसवाल</figcaption></figure>
<p>तेलगू फिल्मों का केंद्र तेलंगाना, तमिल फिल्मों का केंद्र तमिलनाडु, मलयाली फिल्मों का केंद्र केरला तो बंगाली फिल्मों का केंद्र कोलकाता है। भाषा आधारित इन फिल्मों और इस पर आधारित फिल्म उद्योग का केंद्र वही राज्य है जहाँ इनकी राज्य की आधिकारिक भाषा वही भाषा है जो वहां की फिल्मों का भाषा है। सिर्फ हिंदी फिल्म और उसकी छाया में विकसित भोजपुरी फिल्म उद्योग ही ऐसा है जो उस राज्य में हैं जिसकी आधिकारिक राज्यभाषा मराठी प्रथम है।</p>
<p>एक जगह विशेष पर फिल्म उद्योग एवं उसके इकोसिस्टम विकसित होने के कई कारण होते हैं जिसमें प्रमुख रूप से फिल्म उद्योग में प्रयोग होने वाले कैमरा, लाइट, परिवहन साधन, सेट बनाने वाली फर्में और सामग्री, क्राफ्ट एवं आर्ट आपूर्ति की फर्में, संगीत रिकॉर्डिंग स्टूडियो, फिल्म सेट स्टूडियो, एडिटिंग लैब, प्रीमियर थिएटर, सिनेमा हाल वितरकों का जमावड़ा और आजकल के हिसाब से डिजिटल प्लेटफार्म उपलब्ध कराने वाले कम्पनियों का ऑफिस और अनुकूल फिल्म नीति और यह सब जहाँ रहता है वहां फिल्म उद्योग फलफूल पाता है और इस कारण जो इसके मानवीय संसाधन हैं जैसे की फिल्म कलाकार, निर्माता, निर्देशक वितरक एवं अन्य सहायक लोग ऐसी जगह पर इक_ा होते हैं और यही कारण है कि इन सब इकोसिस्टम की उपलब्धता के कारण मुंबई में फिल्म उद्योग फला फूला।</p>
<p>एक और बड़ा कारण मुंबई सहित दक्षिण भारत में फिल्म उद्योग की स्थापना का रहा है वह है सूर्य के प्रकाश और मौसम की अनुकूलता, उत्तर भारत में जहां अत्यधिक सर्दी और अत्यधिक गर्मी और कुहासे का मौसम रहता है ऐसे में शूटिंग लायक मौसम सितम्बर से लेकर मार्च तक ही रहता है जो कुल मिला के 6 माह की होती है जबकि ऊपर के अन्य जगहों में कम से कम 9 माह तक सूर्य का प्रकाश और मौसम की अनुकूलता रहती है बाकी बचे 3 महीने में ये इनडोर काम करते रहते हैं।</p>
<p>नोएडा में नई फिल्मसिटी की घोषणा और कोरोना काल दोनों ने एक ऐसा अवसर पैदा किया है जिससे उत्तर प्रदेश में भोजपुरी फिल्म उद्योग की शिफ्ट किया जा सकता है, इससे फिल्मों की उत्पादन लागत भी कम आएगी स्वत: उपस्थित फिल्म की लोकेशन के कारण उन्हें अलग से कृत्रिम सेट बनाने की जरुरत और महंगा किराया और बड़े लोजिस्टिक खर्च नहीं देने पड़ेंगे। कोरोना काल के कारण भोजपुरी फिल्म उद्योग के कई कलाकार यूपी को रिवर्स पलायन कर चुके हैं जिसका प्रमाण आप उधर खुल रहे कई म्यूजिक रिकॉर्डिंग स्टूडियो के रूप में देख रहे होंगे, कई तो अब मुंबई वापस भी आना नहीं चाहते हैं क्यों की कुछ फिल्मों की शूटिंग यूपी में होनी है तो उन्हें शूटिंग शुरू होने का इन्तेजार है।</p>
<p>यही सही मौका है भोजपुरी फिल्म उद्योग को यूपी में खासकर मध्य यूपी एवं पूर्वांचल में फिर से खड़ा किया जा सकेगा क्यों की बहुमत में इस उद्योग के मानवीय संसाधन यूपी में ही कोरोना के कारण पलायित हो आ चुके हैं, दूसरा यह संयोग ही है की गोरखपुर के सांसद रविकिशन भी भोजपुरी फिल्म इंडस्ट्री के अगुवा हैं और वर्षों से फिल्मसिटी निर्माण के लिए प्रयासरत थे, इनकी पहल और नेतृत्व इस उद्योग को यहाँ खड़े करने में महती भूमिका निभाएगा।</p>
<p>अब सरकार को इन संयोग से मिले संसाधनों का संयोजन कर उनमे जान फूंक कर इस उद्योग को खड़ा करने में लगने वाले पूंजीगत खर्चों जैसे की प्राइवेट फिल्म सिटी का निर्माण, स्टूडियो का निर्माण, डिजिटल एवं एडिटिंग लैब आदि की स्थापना इक्विपमेंट एवं प्लांट की खरीद आदि में सब्सिडी दे ताकि फिल्मों का इकोसिस्टम विकसित हो और उसके इर्दगिर्द फिल्म जगत के सारे कारक आकर इकठ्ठा हो जाएँ, जैसे की वितरक निर्माता और वितरण डिजिटल से जुडी कम्पनियां भी। फिल्मों की सब्सिसी तो पहले से ही जारी है।</p>
<p>साथ ही सरकार को नॉएडा फिल्म सिटी के उन कारणों से सीख लेनी पड़ेगी की क्यों इतना बड़ा फिल्मसिटी बहुत पहले से ही नॉएडा में बनने के बाद उत्तर भारत के फिल्मकारों की पहली पसंद न बन सका और आज भी पहली पसंद मुंबई ही है, फिल्म का बाजार मुंबई से शिफ्ट नहीं हुआ है। इस मामले में कंगना रानावत का सुझाव भी काफी अच्छा है जिसमें उन्होंने कहा था की लोगों की धारणा है कि भारत में शीर्ष फिल्म उद्योग हिंदी फिल्म उद्योग ही है ये धारणा गलत है।</p>
<p>फिल्म उद्योग में तेलुगू फिल्म इंडस्ट्री शीर्ष स्थान पर पहुंची है और अब कई भाषाओं में फिल्में बनाकर पूरे भारत को कवर कर रही है, कई हिंदी फिल्मों को रामोजी हैदराबाद में शूट किया जा रहा है। योगी आदित्यनाथ जी की पहल का सराहना करते हुए कंगना का सुझाव भी काफी अच्छा है जिसमें उन्होंने कहा की हमें फिल्म उद्योग में कई सुधारों की आवश्यकता है।</p>
<p>सबसे पहले हमें भारतीय फिल्म उद्योग नामक एक बड़ी एकीकृत फिल्म उद्योग के स्थापना की आवश्यकता है, हम आज कई कारकों के आधार पर विभाजित हैं, जबकि एकीकृत फिल्म उद्योग के रूप में हॉलीवुड फिल्मों को इसका लाभ मिलता है जैसे की एक एकीकृत राष्ट्रीय उद्योग लेकिन कई जगहों पर फिल्मसिटी, नि:संदेह यह सलाह उचित है और सही दिशा है इसे राष्ट्रीय स्तर पर भी चिंतन करना चाहिए ताकि एकीकृत फिल्म उद्योग की स्थापना हो।</p>
<p>उत्तर प्रदेश में उत्तर प्रदेश फिल्म विकास परिषद् को इसके लिए सक्रिय भूमिका निभानी पड़ेगी और सबसे पहले इसके चेयरमैन को स्थायी तौर पर लगातार लखनऊ में बैठना पड़ेगा और प्रतिदिन कार्यालय जाना पड़ेगा ताकि उनका चिंतन और फोकस प्रतिदिन इस विषय पर हो तभी परिणाम निकल पायेगा और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ का विजन सम्पूर्ण हो पायेगा।</p>
<p>दूसरा तुरंत भोजपुरी फिल्म उद्योग के जितने भी स्टेक होल्डर हैं। उनकी एक बैठक लखनऊ में आयोजित कर या वर्चुअल मीटिंग आयोजित कर उनसे एक इनपुट लिया जाना चाहिए कि उत्तर प्रदेश को भोजपुरी फिल्म उद्योग का केंद्र बनाने के लिए उनके क्या सुझाव हैं। तीसरा फिल्म ट्रेनिंग इंस्टिट्यूट पुणे की तर्ज पर एक इंस्टीट्यूट की स्थापना हो। यह एक चलता हुआ उद्योग है इसको एक हल्का सा पुश प्रदेश में रोजगार और देश के फिल्म उद्योग में एक बड़ा केंद्र हो सकता है।</p>
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		<title>जीडीपी नहीं जीवन के आंकड़े अनमोल</title>
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		<pubDate>Wed, 02 Sep 2020 10:58:21 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी]]></category>
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		<category><![CDATA[स्माल इंडस्ट्रीज एंड मैन्युफ़ैक्चर्रस एसोसिएशन]]></category>

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		<description><![CDATA[पंकज जायसवाल जीवन है तो सब है। मृत्यु के बाद सब कुछ यहीं छोड़ के जाना है, चिता के साथ कुछ भी नहीं जाता है। जीवन है तो अर्थ का मूल्य है अन्यथा निर्मूल्य। अर्थशास्त्र का भी अंतिम उद्देश्य है सुख एवं संतुष्टि। सनातन अर्थशास्त्र का उद्देश्य पारिस्थितिकीय तंत्र सुखी रहे, मानव सुखी रहे, राज्य &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/08/pankaj-sir-copy.jpg"><img class="alignnone  wp-image-21888" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/08/pankaj-sir-copy.jpg" alt="pankaj sir copy" width="111" height="116" /></a></p>
<p><strong>पंकज जायसवाल</strong></p>
<p>जीवन है तो सब है। मृत्यु के बाद सब कुछ यहीं छोड़ के जाना है, चिता के साथ कुछ भी नहीं जाता है। जीवन है तो अर्थ का मूल्य है अन्यथा निर्मूल्य। अर्थशास्त्र का भी अंतिम उद्देश्य है सुख एवं संतुष्टि। सनातन अर्थशास्त्र का उद्देश्य पारिस्थितिकीय तंत्र सुखी रहे, मानव सुखी रहे, राज्य सुखी रहे, समाज सुखी रहे और परिवार सुखी रहे एवं पृथ्वी या ऐसे किसी अन्य ग्रह पर जहां जीवन है या इस जीवन वाले ग्रह जैसे की पृथ्वी पर जीवन निर्बाध गति से चलता रहे और ब्रह्माण्ड में खगोलीय संतुलन बना रहे।</p>
<p>ऐसे किसी भी समृद्धि सम्पन्नता या कार्य का कोई महत्व नहीं है यदि वह ग्रह पर जीवन को सुरक्षित न रख पाए। इसलिये जो सबसे बड़ी पूंजी है वह है जीवन, जीवन है तो अर्थ का मोल है, सारे व्यापार, उद्योग एवं राज्य है, पृथ्वी का आस्तित्व है, जीवन नहीं है तो कुछ भी नहीं है। अर्थशास्त्र वहीं आकर खत्म हो जाता है जहां इसके कारण किसी व्यक्ति का, मानव मात्र का, पृथ्वी का, ब्रह्माण्ड का, इसके खगोलीय संतुलन का आस्तित्व खतरे में आ जाये।</p>
<p>सनातन अर्थशास्त्र ऐसे किसी भी विकास को अपनी श्रेणी में शामिल नहीं करता। सनातन अर्थशास्त्र का सूत्र वाक्य ही सनातन है अर्थात नश्वर कभी न समाप्त होने वाला। ऐसा कोई भी कार्य उद्यम या व्यापार जो पारिस्थितिकीय तंत्र, मानव, राज्य, समाज, परिवार, पृथ्वी या ऐसे किसी अन्य ग्रह पर जहां जीवन है कि खुशी के लिए उसकी नश्वरता और उसकी निरंतरता की गति बरकरार रखने के लिए किया जाय वह सनातन अर्थशास्त्र के दायरे में आता है।</p>
<p>एक उदाहरण बताता हूं, मेरे एक मित्र थे, उनकी विकास की गति बहुत तेज थी और लगातार विकास करते करते और विकास करने की धुन में वो अपने खुद के और अपने परिवार दोनों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे और एक दिन पता चला कि उन्हें कैंसर की बीमारी हो गई है और इसके पता चलने के तीन माह के अन्दर उनकी मृत्यु हो गई। इस कहानी के द्वारा मैं यह बताना चाहता हूं कि विकास जरुरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरुरी है विकास की गति क्या हो। इसको समझना, लगातार तेज गति से दौडऩे से हार्ट अटैक भी आ सकता है, विकास की दौड़ यदि छोटी हो तो बहुत तेज दौडऩा न्यायसंगत हो सकता है, लेकिन यदि विकास की दौड़ लम्बी हो तो बीच बीच में आराम और सांस लेने के लिए रुकना भी पड़ सकता है, कभी कभी धीमा भी चलना पड़ता है। दौड़ाने की जगह तब जाकर आब विकास की दौड़ यदि मैराथन हो तो जीत सकते हैं।</p>
<p>ठीक यही नियम देश के विकास की दौड़ पर लागू होती है, ठीक है यह जरुरी है कि देश विकास करे लेकिन यह जनमानस की सहूलियत और अनुकूलन के हिसाब से होना चाहिए। कई बार ऐसा लगे कि जनमानस कुछ निर्णयों से परेशान हो रहा है या उसका सांस फूल रहा है तो कुछ समय के लिए रूक कर ठहर कर माहौल के अध्ययन के लिए ही सही विकास के आगे सरवाईवल को प्राथमिक कर देना चाहिए।</p>
<p>आज चारों ओर कोरोना का कहर जारी है। यह देश की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को चोट पहुंचा रही है, सरकार को और जन को इन दोनों के बीच चुनाव करना पड़ेगा कि इन दोनों के बीच सबसे कीमती क्या है? फिर उसे प्राथमिकता में लेना पड़ेगा, लाजिमी है कि जीवन सबसे कीमती है, अनमोल है, जीवन ही नहीं बचेगा तो विकास को प्राप्त कर क्या करेंगे।</p>
<p>आज चारों तरफ आलोचना हो रही है। जीडीपी के गिरने को लेकर, लेकिन यह तो प्रत्याशित और स्वाभाविक था और वैश्विक भी होगा, जब सब कुछ बंद रहेगा तो माल और सेवा में सौदे कहां से होंगे और जब नहीं होंगे तो जीडीपी के आंकड़े तो गिरेंगे ही न, इसलिए जीडीपी के गिरने से चिंतित होने की जरुरत नहीं है, क्योंकि अभी घर बचाने से ज्यादे जरुरी जीवन बचाना है। जब 300 केस थे तो लॉकडाउन लग गया और आज जब 36 लाख से ज्यादा केस हैं तो लॉकडाउन की आज सर्वाधिक जरुरत है, लोग अब इस बीमारी को समझ चुके हैं मजदूर अपनी-अपनी जगह सेटल हो चुके हैं अब लगता है कि व्यवस्थित और नियोजित लॉकडाउन एक बार लगा कर इस चेन को तोडऩा चाहिए।</p>
<p>इस कोरोना काल में एक चीज और दुखदाई है वह है कोरोना की चेन तोडऩे के चक्कर में मेडिकल चेन ब्रेक हो गई है और लोगों की अन्य बीमारियों में ट्रीटमेंट टाइम से नहीं मिलने और अस्पताल में जगह न मिलने से मृत्यु हो रही है। सरकार को देखना चाहिये कि यह मेडिकल चेन ब्रेक न हो वह इसकी व्यवस्था करे और फोकस जल्दी से और तुरंत परिणाम वाले टेस्टिंग जांच को बढ़ावा दे, जब तक वैक्सीन नहीं आ जाता है।</p>
<p>साथ में सरकार को बजट की समस्या यदि आती है तो घोषित बजट मदों को पुनर्गठित कर दोबारा बजट बनाये ताकि अन्य मदों के खर्च को कम कर उस मद को स्वास्थ्य एवं जनता के ऋण किश्त की राहत में लगाये अन्यथा सितम्बर से जनता को कोरोना से तगड़ी चोट लगने वाली है। चूंकि कोरोना से लड़ाई के लिए अब राज्य सरकार को जिम्मेदार बनाया गया है। अत: राज्यों को बकाये जीएसटी की राशि को इसे देना चाहिए, ताकि वह इसे कोरोना की लड़ाई में लगा सके और चंूकि जनता को भी आत्मनिर्भर बनाने की अपील की गई है तो उसे भी सरकार को इस लड़ाई में लडऩे के लिए सक्षम और आत्मनिर्भर बनने लायक बनाना पड़ेगा।</p>
<p>कोरोना का डाटा जिस तेजी से बढ़ रहा है लग रहा है कि इस कहर में हम दुनिया में दूसरे नम्बर पर आ जायेंगे, जबकि अन्य देशों के मुकाबले यहां पर दिए गए वित्तीय पैकेज उतने प्रभावी नहीं थे। बैंकों की मनमानी चल ही रही थी, रिजर्व बैंक ने अपने आदेश को प्रभावी रूप में लागू करने में सफल नहीं रहा था और उसके मोरेटेरियम की अवधि भी 31 अगस्त को खत्म हो रही है। मतलब सितम्बर में आय तो कोई खास बढ़ी नहीं। मास्क-सेनिटाइजर और अन्य इम्यून सिस्टम से सम्बंधित खर्चे बढ़ गए, बिक्री व्यापार लगभग नगण्य है, हर व्यक्ति हानि में चल रहा है यहां तक कि सरकार भी हानि में चल रही है, ऐसे में यदि बैंकों के आय मीटर पर लगाम नहीं लगाई गई तो सितम्बर का महीना भारत के लिए दुखदाई होगा और अगर किश्त में राहत नहीं मिली तो हो सकता है कि जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करे।</p>
<p>अत: सरकार को अपनी प्राथमिकता सूची में अर्थव्यवस्था से ऊपर स्वास्थ्य और जनता की वित्तीय परेशानी देखनी पड़ेगी और उसके बाद अर्थव्यवस्था, जीडीपी के गिरते आंकड़े। सरकार को आर्थिक आंकड़े से चिंता की उतनी जरुरत नहीं है, जितना कोरोना के बढ़ते आंकड़े से चिंतित होने की जरुरत है, क्योंकि जान है तो जहान है और 2020 का शुद्ध लाभ जीवन है और कुछ नहीं।</p>
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		<title>टैक्स वैलेट योजना लाये सरकार</title>
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		<pubDate>Thu, 30 Jul 2020 08:53:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Uncategorized]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
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		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश सरकार]]></category>
		<category><![CDATA[कोरोना]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी]]></category>
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		<description><![CDATA[जिस प्रकार कोरोना ने आम आदमी और व्यापारियों के आय को बुरी तरह से प्रभावित किया है, उसी तरह से इस कोरोना ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। हम इस परेशानी को ऐसे समझ सकते हैं कि जब हमारे परिवार में पांच लोग हैं तो हम एक तरफ &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>जिस प्रकार कोरोना ने आम आदमी और व्यापारियों के आय को बुरी तरह से प्रभावित किया है, उसी तरह से इस कोरोना ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। हम इस परेशानी को ऐसे समझ सकते हैं कि जब हमारे परिवार में पांच लोग हैं तो हम एक तरफ अपनी खत्म या कम हो रही आय और दूसरी तरफ उनके स्वास्थ्य और भोजन की चिंता को लेकर चिंतित हैं तो सरकार के पास तो 130 करोड़ का परिवार है उनकी चिंता कितनी बड़ी होगी, और ऐसे समय में जब उन्होंने अपने लगभग सारे टैक्स संग्रह को आगे कई महीनों तक सरका दिया है, मतलब जब तक कोई स्वेच्छा से एडवांस टैक्स ना भरे तो सरकार को आय होने वाली नहीं है और जब सरकार को आय होगी नहीं तो वह इतना बड़ा स्वास्थ्य इन्फ्रा को कब तक खींच पाएगी। अत: यह जरूरी है कि सरकार में इस पर मंथन हो की सरकार अपने राजस्व की व्यवस्था कैसे करे। इस सम्बंध में सरकार को कुछ सुझाव है जिस पर अमल कर सरकार पाने लिए वित्त की व्यवस्था कर सकती है।<br />
पहला सरकार को सबसे पहली अपने घोषित बजट का पुनर्गठन करना चाहिए। बजट 2020-21 देश में सामान्य परिस्थितियों के लिए पारित हुआ था और वित्त वर्ष शुरू होते ही देश असामान्य परिस्थितियों से घिर गया है अब तक एक तिहाई वर्ष बीत चुका है और आगे भी स्पष्ट नहीं है की असामान्य परिस्थिति का माह कितना लम्बा चलेगा। मोटा-मोटी अनुमान है कि दिसम्बर से हालात सामान्य होंगे और फिर पहले जैसी पटरी पर शायद 2021-22 से देश चले। ऐसे में बजट 2020-21 में घोषित सभी अनुमान, संग्रह लक्ष्य एवं योजनागत एवं गैर योजनागत खर्च सबकी राशि बदलनी वाली है। सबकी प्राथमिकताएं बदलने वाली हैं।</p>
<p>अत: बजट का पुनर्गठन किया जाए, बजाये वित्त वर्ष के अंत में न प्रयोग किये गए राशि को सरकार को वापस कर, उससे पहले जिस विभाग को उस फंड की सबसे अधिक जरूरत है। जैसे कि स्वास्थ्य में अधिक बजट आवंटित हो और जिस मंत्रालय या विभाग का खर्च इस कोरोना के कारण सिकुड़ गया हो वहां के लिये आवंटित बजट को निरस्त कर उसे जरूरतमंद विभाग को दिया जाय। इस प्रकार सभी बजट मदों का निरीक्षण कर इसका पुनर्गठन किया जाय ताकि इस लड़ाई से लडऩे के लिये सरकार के पास कर संग्रह नगण्य होने की दशा में वित्त का कुछ मद आ सके।</p>
<p>सरकार को कुछ लोग लिकर पर बिक्री की छूट देकर राजस्व संग्रह के लिए बोल रहे हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि इस कदम का सिर्फ आर्थिक प्रभाव ही नहीं सामाजिक प्रभाव भी हैं। अत: लिकर पर कोरोना सेस 100 प्रतिशत लगा, इसे नियंत्रित रूप में आधार लिंक कोटे के तहत सिर्फ एडवांस आर्डर या ऑनलाइन आर्डर के द्वारा बेंचा जाना चाहिए, जिससे राजस्व संग्रह के साथ सोशल डिस्टेंसिंग और अत्यधिक उपभोग से होने वाले सामाजिक अपराध, पारिवारिक कलह और स्वास्थ्य खतरों से भी लोग बच सकें।</p>
<p>इसके अलावा सरकार सबसे अधिक परेशान इसलिए है कि उसने आयकर जीएसटी सबके डेट बढ़ा दिए हैं, टीडीएस की दर भी कम कर दी है। सौदों की साइज भी कम हो गई है। अत: सरकार का राजस्व संग्रह नहीं के बराबर हो गया। बजट में अनुमानित कर की अपेक्षा, अत: इसके लिय सरकार को एडवांस आयकर एवं जीएसटी की एक टैक्स वैलेट स्कीम प्रोत्साहन रूप में लानी चाहिए, जिसके तहत यह लाभ देना चाहिए कि इस संकट के समय लडऩे के लिए जो कोई आयकर या जीएसटी इस वैलेट में देगा उसे इसका क्रेडिट आगे आने वाले अवधियों में चरणबद्ध तरीके से उसके उस कर विशेष के भुगतान में दी जाएगी और यदि किसी ने अपनी भविष्य की कर देयता से ज्यादा टैक्स का भुगतान इस टैक्स वैलेट में कर दिया है तो उसे स्वेच्छा से इस अधिक भुगतान की गई राशि को सरकारी बांड में बदलने का विकल्प देना चाहिए।</p>
<p>सरकार यदि यह विकल्प और टैक्स वैलेट प्रोत्साहन योजना लाती है तो बहुत सी बड़ी कंपनियां जिन्हें कुछ देश के लिए करने के लिए इच्छा है या कॅश रिच हैं, वह इस योजना को अपना सकती हैं, क्योंकि एक तो टैक्स का टैक्स पेमेंट हो जायेगा और देश की सेवा भी हो जायेगी, सरकार चाहे तो जब तक इस वैलेट में पड़ी राशि पर टैक्स पेमेंट या बांड परिवर्तन विकल्प का समायोजन नहीं होता है प्रोत्साहन के रूप में कुछ ब्याज भी दे सकती ताकि लोग करेंट, फिक्स्ड डिपॉजिट या सेविंग की जगह इच्छित राशि को इस वैलेट में रखने के लिए प्रोत्साहित हों। यहां सरकार को करना क्या है, उसे बस इस टैक्स भुगतान को प्री पुल करना है। पोस्टपोन की जगह और इसे प्रोत्साहन योजना से जोड़ देना है। आय का यह एडवांस संग्रह सरकार को आपदा के लिए ऋण लेने और उसके ब्याज के दबाब से भी मुक्त करेगा, और जो थोड़ा बहुत ब्याज देगा भी वह डीबीटी की तरह सीधे पब्लिक को ही मिलेगा। यह योजना केंद्र सरकार अपने सरकारी के लिए और राज्य सरकार अपने अन्य करों की लिए भी ला सकती है।</p>
<p>सरकार ऐसे मुश्किल हालत और असामान्य परिस्थितियों में पुन: छुपाये हुए आय, बेनामी संपत्ति या काले धन की स्वैच्छिक घोषणा की स्कीम ला सकती है जो उसने कुछ वर्ष पूर्व लाया था और पचास प्रतिशत टैक्स के भुगतान के रूप में बड़ी मात्रा में टैक्स का संग्रह कर सकती है, चूंकि यह असामान्य हालात हैं अत: सरकार को ऐसे असामान्य और विशेष निर्णय और आउट ऑफ द बॉक्स जाकर सोचना और लेना चाहिए।</p>
<p>स्वास्थ्य बजट पर पडऩे वाले दबाब को देखते हुए सरकार चाहे तो स्वास्थ्य बजट को टैक्स विवेकाधिकार योजना के तहत डायरेक्ट फंडिंग की भी योजना ला सकती है, जिसके तहत नागरिक, कंपनियां या फर्में डायरेक्ट स्वास्थ्य बजट अकाउंट में टैक्स का भुगतान करें और यदि इस अकाउंट में बजट से ज्यादा पैसे आ जाते हैं तो सरकार का विवेकाधिकार लागू हो जाए। चूंकि भारत का मूल चरित्र लोकोपकार का है। अत: चाहे टैक्स की उपरोक्त वैलेट स्कीम हो या स्वास्थ्य बजट को डायरेक्ट टैक्स फंडिंग की योजना हो जनता हाथों हाथ लेगी और हां इस स्वास्थ्य बजट के डायरेक्ट टैक्स फंडिंग टैक्स विवेकाधिकार स्कीम योजना के तहत आये राशि को आयकर की धारा 80 सी के तहत नहीं सीधे टैक्स पेमेंट ही मान लेना चाहिए, क्योंकि टैक्स का पेमेंट तो घूम कर इस कोरोना काल में स्वास्थ्य बजट में ही प्रयोग होने वाला था।</p>
<p>कोरोना से उपजे इस आर्थिक दिवालियेपन से लडऩे के लिए सरकार को इन उपायों के साथ-साथ आउट ऑफ द बॉक्स चिंतन करने के लिए अर्थ चिंतकों का एक मंडल बनाना चाहिए जिसमें ब्यूरोक्रेट के अतिरिक्त लोग हों जो सरकार को ब्यूरोक्रेट की सोच के अलावा वाले विकल्पों पर प्रकाश डाल सकें और सरकार को दोनों सोच का अध्ययन कर श्रेष्ठ निर्णय लेने का लाभ मिले।</p>
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		<title>यादों में अनकही बात</title>
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		<pubDate>Mon, 27 Jul 2020 09:01:31 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
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		<category><![CDATA[संपादकीय]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश सरकार]]></category>
		<category><![CDATA[प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी]]></category>
		<category><![CDATA[मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ]]></category>

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		<description><![CDATA[डॉ दिलीप अग्निहोत्री आदरणीय लाल जी टण्डन अब हमारे बीच नहीं है। उन्होंने अपनी पुस्तक अनकहा लखनऊ में अनेक तथ्य उजागर किये थे। मिलनसार होना लखनऊ के चिर परिचित मिजाज रहा है। लाल जी टण्डन की जीवन शैली इसी के अनुरूप थी। तरुण अवस्था में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। यहीं से उनका &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p><strong>डॉ दिलीप अग्निहोत्री</strong></p>
<p>आदरणीय लाल जी टण्डन अब हमारे बीच नहीं है। उन्होंने अपनी पुस्तक अनकहा लखनऊ में अनेक तथ्य उजागर किये थे। मिलनसार होना लखनऊ के चिर परिचित मिजाज रहा है। लाल जी टण्डन की जीवन शैली इसी के अनुरूप थी। तरुण अवस्था में वह राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ से जुड़े। यहीं से उनका सामाजिक जीवन शुरू हुआ था। इसके बाद समाज के बीच रहना, हमेशा लोगों से मिलना जुलना,सभी के सुख दुख में सहभागी होना उनके स्वभाव का हिस्सा बन गया। उन्होंने समाज जीवन में अनेक उतार चढ़ाव देखे, पार्षद से लेकर सांसद, मंत्री, राज्यपाल तक हुए, लेकिन उनके मूल स्वभाव में कभी परिवर्तन नहीं हुआ। अटल बिहारी वाजपेयी को राजनीति में अजातशत्रु कहा जाता है। लाल जी टण्डन उनके अनुज की तरह थे। अटल जी की तरह उन्हें भी यही पहचान मिली। राजनीति में मतभेद खूब रहा। लेकिन उन्होंने भी अटल जी की तरह मनभेद पर विश्वास नहीं किया। वैचारिक प्रतिबद्धता सदैव रही,कभी उससे विचलित नहीं हुए।</p>
<p>एक बार लखनऊ राजभवन में उनसे मुलाकात हुई। वही उनकी चिरपरिचित सहजता। तब वह चुनावी राजनीति से अलग हो चुके थे। लखनऊ से उन्होंने दुबारा लोकसभा चुनाव लड़ने से इनकार कर दिया था। मैंने आदरणीय टण्डन जी से कहा कि आप इस समय राजभवन में आये है,मेरी अभिलाषा है कि आप राजभवन में रहें। वह मुस्कराये, बोले क्या मतलब। उन्होंने मेरे कथन पर क्या सोचा होगा, मैं नहीं जानता। मैनें कहा कि आप भी राज्यपाल बनें। उन्होंने जो कहा उससे उनके राजनीतिक सिद्धान्त व वैचारिक निष्ठा का अनुमान लगाया जा सकता है।</p>
<p>उन्होंने कहा कि राजनीति में पहले दिन से लेकर आज तक मैनें अपने लिए कुछ नहीं मांगा। किसी पद की अभिलाषा नहीं की,अपने बारे में स्वयं कोई निर्णय नहीं लिया। जो पार्टी का आदेश हुआ,उस पर अमल किया। यह सुखद संयोग था कि इसके कुछ समय बाद वह बिहार के राज्यपाल बनाये गए। इसके पहले संवैधानिक मर्यादा के अनुरूप भाजपा से त्यागपत्र दे दिया था। इसके बाद उन्हें मध्यप्रदेश का राज्यपाल नामित किया गया था। दोनों प्रदेशों में उन्होंने संविधान के अनुरूप अपने दायित्वों का निर्वाह किया। वहां के लोगों से संवाद बनाये रखा। सीमित समय में ही बिहार और मध्यप्रदेश में आमजन के बीच रहने वाले राज्यपाल की उनकी छवि बनी थी। वैचारिक निष्ठा के उनके कथन का एक संस्मरण याद आया।</p>
<p>टण्डन जी लखनऊ में पत्रकारों को चाट की दावत पर आमंत्रित करते थे। यह उनका नियम बन गया था। इसमें बड़ी सहजता से वह सभी पत्रकारों से मिलते,बात करते थे। एक बार राजकुमार प्लाजा के सामने स्थित उनके सरकारी आवास पर ऐसी ही चाट पार्टी थी। राजनीति की हल्की फुलकी बात भी चल रही थी। एक प्रश्न के जबाब में टण्डन जी ने आवास के बगल में स्थित ऊंची दीवार की ओर इशारा किया। कहा कि पार्टी आदेश करे तो मैं इस दीवार से भी कूद जाऊ। उनकी बात पर ठहाका लगा। लेकिन यह उनकी वैचारिक निष्ठा को उजागर करने वाला प्रतीक था। जब वह भारतीय जनसंघ के सदस्य बने, तब संघर्ष का दौर था। यह माना जाता था कि कांग्रेस के व्यापक प्रभुत्व को तोड़ा नहीं जा सकता। जनसंघ की स्थापना सत्ता के लिए नहीं हुई है।</p>
<p>इसलिए पद नहीं सेवा की प्रेरणा वाले ही इसके सदस्य बनते है। टण्डन जी भी उन्हीं में एक थे। परिवार व व्यवसाय से अधिक ध्यान वह समाज सेवा में लगाते थे। पार्टी के आदेश पर वह पूरी क्षमता से अमल करते थे। बसपा से गठबंधन का निर्णय भी उनका नहीं था। लेकिन जब दायित्व मिला तो वही उसके शिल्पी थे। आदरणीय लाल जी टण्डन के समाज जीव की शुरुआत सामाजिक सांस्कृतिक संगठन आरएसएस से हुई थी। उन्नीस सौ साठ में वह सक्रिय राजनीति में आये। दो बार पार्षद और दो बार विधान परिषद सदस्य रहे। तीन बार विधानसभा और एक बार लोकसभा के लिए निर्वाचित हुए। कल्याण सिंह, बसपा गठबन्धन और राजनाथ सिंह सरकार में वह कैबिनेट मंत्री रहे। इसके अलावा विधानसभा में नेता प्रतिपक्ष का दायित्व भी उन्होंने बखूबी निभाया था। पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी के राजनीति से दूर होने के बाद लखनऊ लोकसभा सीट खाली हुई थी। उनके लखनऊ से उत्तराधिकारी के रूप में पार्टी ने उन्हें प्रत्याशी बनाया था। वह भारी बहुमत से विजयी हुए थे। वह अटल जी को अपना भाई,पिता,मित्र मानते थे। सादर नमन !</p>
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		<title>कोरोना काल और स्कूल फीस</title>
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		<pubDate>Fri, 17 Jul 2020 11:00:24 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[विचार मंच]]></category>
		<category><![CDATA[शिक्षा]]></category>
		<category><![CDATA[कोरोना]]></category>

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		<description><![CDATA[पंकज जायसवाल मुंबई। तमाम अन्य बदलावों और परेशानियों के साथ इस कोरोना काल ने पढ़ने, पढ़ाने, निजी या गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के तौर तरीकों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इस पर बहस करने से पूर्व आइये इसके कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जान लेते हैं। इन निजी स्कूलों में पढने वाले बच्चों &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p style="font-weight: 400"><strong>पंकज जायसवाल</strong></p>
<p style="font-weight: 400"><strong>मुंबई।</strong> तमाम अन्य बदलावों और परेशानियों के साथ इस कोरोना काल ने पढ़ने, पढ़ाने, निजी या गैर सरकारी सहायता प्राप्त स्कूलों के तौर तरीकों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। इस पर बहस करने से पूर्व आइये इसके कुछ महत्वपूर्ण तथ्यों को जान लेते हैं। इन निजी स्कूलों में पढने वाले बच्चों के अधिकांश माता-पिता मध्य वर्ग से आते हैं जो इस कोरोना काल से ज्यादे प्रभावित हैं क्योंकि इनकी एक बड़ी संख्या प्रधानमंत्री गरीब कल्याण योजना के तहत नहीं आती है अतः यह सरकार के कोरोना काल में प्रत्यक्ष सहायता हेतु उसके जन चिंतन दर्शन में नहीं आते हैं। इसमें से जो माता-पिता नौकरी वाले हैं उनमें से कईयों को वेतन कटौती कर के मिल रहें हैं और कुछ को नौकरी से छंटनी किया जा रहा है और कोरोना काल में कम्पनियां जहां अपने आप को सिकोड़ रहीं हैं  वहां अब इन निकाले गए लोगों को नौकरी की संभावनाएं नगण्य हैं। इसी प्रकार जो लोग स्वव्यवसाय में हैं उनके भी आय का मीटर बहुत डाउन है और वह अपने घर के किराये किश्त और दवाई के खर्चे से ही परेशान हैं ऐसे में उनके बच्चों को जो शिक्षण सेवा स्कूलों से मिलती थी उसकी मात्रा में भारी कमी होने के बावजूद भी यदि इन मुश्किल परिस्थितियों में फीस देना पड़ रहा है तो यह उनके लिए कष्टप्रद है।</p>
<p style="font-weight: 400">इसी बीच और भी कुछ घटनाएँ हुईं, महाराष्ट्र सरकार ने फीस नहीं बढ़ाने का नोटिफिकेशन लाया था जिसपर बॉम्बे हाई कोर्ट ने स्टे लगा दिया, हालाँकि यह स्टे तकनीकी और नोटिफिकेशन लाये जाने के तरीकों के कारण है इसमें फीस लेने नहीं लेने या कम लेने के गुण दोष की मीमांसा नहीं है। इसी बीच दिल्ली के निजी स्कूलों के संगठन ने कहा कि चूँकि लॉकडाउन ख़त्म हो गया है अतः जो रोक फीस वसूलने में लगी थी वह लॉकडाउन ख़त्म होने से रोक स्वतः ही हट गई हालाँकि दिल्ली सरकार ने कहा कि यह अनलॉक का मतलब लॉकडाउन हटना नहीं है यह आंशिक रूप से छूट है, स्कूल ट्यूशन शुल्क के अलावा कुछ भी चार्ज नहीं कर सकते हैं। यह एक अलग विमर्श है कि कानूनी तौर पर जो छूटें लॉकडाउन के कारण मिली थीं तो क्या अब अनलॉक का नामकरण हुआ है तो क्या वह छूटें ख़त्म हो गईं।</p>
<p style="font-weight: 400">इसके अलावा आठ राज्यों में विभिन्न स्कूलों में पढ़ रहें बच्चों के माता-पिता ने याचिका के माध्यम से माननीय सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था, जिसमें माननीय कोर्ट से कोरोनो वायरस के कारण हुए लॉकडाउन के दौरान निजी स्कूलों में फीस के लिए नियामक तंत्र लाने की बात कही गई थी। याचिका में कहा गया था कि निजी गैर-सहायता प्राप्त / सहायता प्राप्त स्कूलों को यह निर्देश दिया जाय कि अप्रैल से शुरू होने वाली तीन महीने की अवधि या भौतिक रूप से कक्षाएं शुरू होने तक किसी भी नामांकित छात्रों से कोई शुल्क नहीं लिया जाए। इनके तर्क थे की ऑनलाइन कक्षाओं के लिए पूरी फीस नहीं ली जानी चाहिए और दावा किया गया था कि कुछ स्कूल ऑनलाइन कक्षाओं के लिए भी अतिरिक्त शुल्क ले रहे हैं। याचिका में यह भी सुनिश्चित करने की मांग की गई थी कि केंद्र और राज्य सरकारें निजी गैर-सहायता प्राप्त और सहायता प्राप्त स्कूलों को निर्देश दें कि वे छात्रों को कक्षा से न निकालें या इस दौरान कोई फीस नहीं दे पाता है तो उसके ऊपर कोई  कोई दंड या अधिभार न लगाया जाय । इनके दलील में कहा गया था कि तालाबंदी के दौरान माता-पिता को लगातार वित्तीय और भावनात्मक कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है और यह उनमें से हो सकता है की फीस न भर पाने की परिस्थिति में अपने बच्चों को स्कूल से निकलने के अल्वा कोई और विकल्प ना हो। याचिका में कहा गया था  कि निजी स्कूल प्रशासन बिना किसी सेवाओं के रेंडर किए बिना शुल्क और अन्य शुल्क की मांग कर रहे हैं और अथॉरिटी ने भारत के विभिन्न हिस्सों में माता-पिता और छात्र के विरोध के बावजूद इसको लेकर कोई कार्रवाई नहीं की है।</p>
<p style="font-weight: 400">याचिका में कहा गया कि शुल्क वसूली को सही ठहराने के लिए कुछ स्कूलों ने तालाबंदी की अवधि के दौरान ऑनलाइन कक्षाएं शुरू की हैं, ताकि वे यह तर्क दे सकें कि वे अपने छात्रों को शिक्षा प्रदान कर रहे हैं जबकि ऑनलाइन कक्षाएं शैक्षणिक संस्थानों को चलाने के दायरे में नहीं आती हैं। याचिका में कहा गया था कि भौतिक कक्षा और ऑनलाइन कक्षा में अंतर होता है और महामारी या देशव्यापी तालाबंदी में, स्कूल प्रशासन ऑनलाइन कक्षाएं के लिए भौतिक कक्षाओं की तरह समान शुल्क और खर्च नहीं वसूल सकता । ऑनलाइन कक्षाओं के कई दुष्प्रभाव और अवगुण हैं जो स्कूली शिक्षा की मूल अवधारणा से बिल्कुल अलग है। छात्रों को ऑनलाइन माध्यम से समझने में बहुत समस्या होती है। याचिका में कहा गया है कि महामारी के कारण और प्रवेश फॉर्म में आपदाकाल क्लॉज के अभाव में, अथॉरिटी को छूट के संबंध में एक निर्णय लेना चाहिये और लॉकडाउन की अवधि के लिए शुल्क में राहत प्रदान करनी चाहिए। याचिका में और भी बहुत से बिंदु कहे गए थे। हालाँकि सुप्रीम कोर्ट ने इस याचिका पर विचार करने से इनकार कर दिया और राहत के लिए उच्च न्यायालयों से संपर्क करने को कहा। शीर्ष अदालत ने कहा कि यह एक गहन तथ्य का विषयवस्तु है और चूँकि प्रत्येक राज्य में समस्याएं एवं तथ्य अलग-अलग हैं अतः बेहतर है यह याचिका राज्यों के हाई कोर्ट में दाखिल किये जाएँ। हालाँकि इस ख़ारिज में भी तकनीकी कारण है इसमें फीस लेने नहीं लेने या कम लेने के गुण दोष की मीमांसा नहीं है।</p>
<p><span style="font-weight: 400">आइये इसके गुण दोष की मीमांसा करते हैं। भारत में स्कूल की अवधारणा में लाभ हानि का सिद्धांत नहीं है यह हमेशा से गैर लाभ की संस्था जैसे की ट्रस्ट एवं सोसाइटी को ही चलाना है अतः कोई स्कूल लाभ हानि की बात करता है तो वह नियमतः गलत कहता है और उसका ट्रस्ट एवं सोसाइटी का पंजीयन रद्द भी किया जाना चाहिए इस आधार पर। साथ में स्कूल की अवधारणा लाभार्थियों की सेवा आधारित है और यदि वह सेवा नहीं या कम दे रहें है तो शुल्क भी उसी अनुसार लेना चाहिए और शुल्क में यदि कोई कमी आती है तो हानि के नाम पर इसे लाभार्थियों से वसूल नहीं किया जाना चाहिए  इसके लिए उन्हें किसी अन्य से डोनेशन लेना चाहिए और यदि इसमें वह समर्थ नहीं पाते तो इस संस्था को उसे हस्तांतरण कर दे जो इनके स्थापना के उद्देश्यों के तहत इस संस्था को चलाने में अपने आपको सक्षम पायें और रही बात सेवा के उचित मूल्य प्राप्त करने के तो भौतिक शिक्षा और ऑनलाइन शिक्षा सेवा में जमीन आसमान का अंतर है</span><span style="font-weight: 400">, बच्चो को वह शिक्षा बिलकुल नहीं मिलती जो भौतिक शिक्षा में मिलती, इस सेवा की मात्रा में भारी कमी है क्यों की उन्हें ना तो साउंड इफ़ेक्ट, ना विजुअल इफ़ेक्ट ना क्लास का वातावरण और ना व्यक्तित्व विकास का मौका मिलता है जिसका वादा निजी स्कूल किये होते हैं उसकी जगह ईमला की तर्ज पर पढाई होती है ऑनलाइन में. अतः जब सेवा का प्रारूप बदल गया तो फीस उस हिसाब से ही होनी चाहिए क्योंकि  जैसी सेवा वैसा शुल्क। साथ में इस ऑनलाइन माध्यम में माता-पिता का खर्च, उनका समय और उनके संसाधनों का इस्तेमाल हो रहा है जबकि स्कूल के इन घंटों के लिए यह सब स्कूल की जिम्मेदारी थी। स्कूल ने भी अपने इन्फ्रा खर्च जैसे की बिजली, यूटिलिटी में भी भारी कमी पाई है वह वेतन और किराये में भी कमी पा रहें हैं कई जगह ऐसे में जो बचत उन्होंने की है कम से कम वह तो फीस घटा कर इस राहत को माता-पिता को दे सकते हैं।</span></p>
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		<title>भारतीय संस्कृति की प्रासंगिकता</title>
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		<pubDate>Thu, 28 May 2020 10:26:02 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<category><![CDATA[डाॅ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय]]></category>
		<category><![CDATA[राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल]]></category>

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		<description><![CDATA[राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल की धार्मिक प्रसंगों में गहरी आस्था है। राज्यपाल बनने के कुछ समय बाद वह मॉरीसस की यात्रा पर गई थी। यहां प्रवासी घाट पर भारतीयों के पहुंचने की एक सौ पचासवीं जयंती पर आयोजित समारोह में वह मुख्यातिथि थी। यहां उन्होंने कहा था कि हमारे पूर्वज डेढ़ शताब्दी पहले यहां रामचरित &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_21267" style="width: 87px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/ddddddd.jpg"><img class="  wp-image-21267" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/ddddddd.jpg" alt="ddddddd" width="87" height="137" /></a><figcaption class="wp-caption-text">डॉ दिलीप अग्निहोत्री</figcaption></figure>
<p>राज्यपाल आनन्दी बेन पटेल की धार्मिक प्रसंगों में गहरी आस्था है। राज्यपाल बनने के कुछ समय बाद वह मॉरीसस की यात्रा पर गई थी। यहां प्रवासी घाट पर भारतीयों के पहुंचने की एक सौ पचासवीं जयंती पर आयोजित समारोह में वह मुख्यातिथि थी। यहां उन्होंने कहा था कि हमारे पूर्वज डेढ़ शताब्दी पहले यहां रामचरित मानस लेकर आये थे। इस विरासत ने आज तक यहां भारतीय संस्कृति को जीवन रखा है। इसके अलावा अयोध्या दीपोत्सव समारोह में भी वह सम्पूर्ण भक्तिभाव से सम्मलित हुई थी। उन्होंने भाव विभोर होकर आरती की थी। पिछले दिनों गंगा यात्रा में भी उन्होंने धार्मिक आस्था का परिचय दिया था।</p>
<p>लॉक डाउन के कारण वह विश्वविद्यालयों में ऑनलाइन परिचर्चा को प्रोत्साहन दे रही है। श्री राम कथा प्रसंग पर आयोजित ऐसी हो ऑनलाइन संगोष्ठी में उन्होंने धर्मिक मान्यता के अनुरूप विचार व्यक्त किये। आनन्दीबेन पटेल ने कहा कि राम हमारी आस्था और अस्मिता के प्रतीक हैं। वह निर्विकार है। इसलिए उन्हें किसी धर्म,जाति और वर्ग के नाम पर सीमित नहीं रखा जा सकता। धर्म वस्तुतः भगवान और मानव के बीच आस्था,विश्वास और श्रद्धा से परिपूर्ण रिश्ते को सुदृढ़ बनाये रखने का माध्यम है। सत्य के मार्ग का अनुसरण करते हुए भगवान,गाॅड,खुदा और वाहे गुरू तक पहुंचा जा सकता है। इस ई-ल संगोष्ठी में रामकथा के मर्मज्ञ जगतगुरू रामानन्दाचार्य स्वामी रामभद्राचार्य भी सम्मलित हुए। डाॅ राममनोहर लोहिया अवध विश्वविद्यालय अयोध्या ने राम नाम अवलंबन एकू अंतर्राष्ट्रीय ई संगोष्ठी का आयोजन किया था।</p>
<p><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/01.jpg"><img class="  wp-image-21463 alignleft" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/01.jpg" alt="01" width="446" height="207" /></a>आनन्दी बेन पटेल ने कहा कि भारतीय लोक जीवन में राम सर्वत्र और सर्वदा प्रवाहमान महाऊर्जा के पर्याय हैं। राम का नाम केवल साधन नहीं अपितु वह साध्य भी है। जो बुराइयों के प्रभाव को नष्ट करता है। मानव मात्र को विपत्ति से मुक्ति प्रदान करता है। भारतीय संस्कृति प्रभु श्रीराम के जीवन मूल्यों से प्रकाशित आत्मबोध प्रदान करने वाली है। आध्यात्म को अपनाकर ही जीवन मूल्यों को सुरक्षित किया जा सकता है। वसुधैव कुटुम्बकम की संकल्पना मर्यादा पुरूषोत्तम श्रीराम से जुड़ी है। इसके अलावा राज्यपाल ने वर्तमान कोरोना आपदा के भी उल्लेख किया। कहा कि हमारे वेदों,पुराणों एवं उपनिषदों में विभिन्न बीमारियों के संबंध में अनेक प्रकार की जड़ी बूटी एवं पेड़-पौधों का जिक्र किया गया है। इसका उपयोग हमारे ऋषि मुनियों और राजवैद्य औषधि के रूप में करते थे। आज भी इन जड़ी बुटियों की प्रासंगिकता बनी हुई है। भारतीय परम्परागत ज्ञान में बीमारियों से बचाव के अनेक उपाय बताए गए हैं। लेकिन समय की जमी धूल ने उसे अदृश्य बना दिया।</p>
<p>प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने देशवासियों को स्वच्छता पर विशेष ध्यान देने का आग्रह किया है। साफ सफाई को अपनाकर निरोग रहा जा सकता है। संक्रमणों से बचाव के लिए सनातन धर्म में हाथ,पैर और मुख धोकर भोजन करने,दांतों से नाखून न काटने,दूसरों के स्नान के तौलिया का प्रयोग न करने आदि के जो नियम बताये गये हैं। उनका सभी को पालन करना चाहिए। स्पष्ट है कि राज्यपाल ने भारतीय संस्कृति व उसके जीवन मूल्यों का वर्तमान परिप्रेक्ष्य में उल्लेख किया। निसंदेह विश्व की यह सबसे प्राचीन संस्कृति आज भी प्रासंगिक है। क्योंकि इसमें उल्लखित दर्शन व विचार शास्वत है।</p>
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		<title>श्रमिकों पर कांग्रेस का स्वांग</title>
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		<pubDate>Wed, 20 May 2020 20:56:00 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीती प्रशासन]]></category>
		<category><![CDATA[विचार मंच]]></category>
		<category><![CDATA[प्रियंका गांधी]]></category>
		<category><![CDATA[योगी आदित्यनाथ]]></category>
		<category><![CDATA[श्रमिक]]></category>

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		<description><![CDATA[श्रमिकों की घर वापसी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गम्भीरता से प्रयास करते रहे है। इस सम्बंध में उनकी कार्ययोजना व्यापक हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसमें श्रमिकों को उनके घर तक पहुंचाने के साथ ही उनके स्वास्थ्य, कोरोना जांच, इलाज, आवश्यकता के अनुसार क्वारण्टान, भोजन, पानी,आदि को शामिल किया गया था। इसमें &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_21267" style="width: 109px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/ddddddd.jpg"><img class="  wp-image-21267" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/ddddddd.jpg" alt="ddddddd" width="109" height="172" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>डॉ दिलीप अग्निहोत्री</strong></figcaption></figure>
<p>श्रमिकों की घर वापसी के लिए मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ गम्भीरता से प्रयास करते रहे है। इस सम्बंध में उनकी कार्ययोजना व्यापक हितों को ध्यान में रखकर बनाई गई थी। इसमें श्रमिकों को उनके घर तक पहुंचाने के साथ ही उनके स्वास्थ्य, कोरोना जांच, इलाज, आवश्यकता के अनुसार क्वारण्टान, भोजन, पानी,आदि को शामिल किया गया था। इसमें उन गांवों का भी ध्यान रखा गया था, जहां इन श्रमिकों को पहुंचना था।</p>
<p>योगी की मंशा थी कि गांवों को भी कोरोना से सुरक्षित रखा जाए। इस व्यापक योजना के अंतर्गत योगी सरकार ने लाखों श्रमिकों को गंतव्य तक पहुंचाया है। यह सही है कि दिल्ली, पंजाब, राजस्थान,महाराष्ट्र से अप्रत्याशित रूप से हुए बड़े पलायन से समस्या बढ़ी है। इससे कोरोना से बचाव का इंतजाम करते हुए श्रमिकों को गंतव्य तक पहुंचाने में बाधा आई है। दूसरे राज्यों से ट्राको में भरकर लोग आने लगे, यह कोरोना के मद्देनजर गम्भीर समस्या था। श्रमिकों की व्यथा सही है। लेकिन जिन राज्यों से उनका पलायन हो रहा था,वहां की सरकारें भी जबाबदेह है।</p>
<p>वह कोरोना नियमों का पालन करते हुए इन श्रमिकों को क्रमशः बसों से भेजती तो यह नौबत ना आती, इन सरकारों ने उत्तर प्रदेश के श्रमिकों का जीवन खतरे में डाला है। इसके साथ ही हजारों गांवों में भी कोरोना की रोकथाम को कठीन बनाया है। योगी आदित्यनाथ का प्रियंका गांधी से प्रश्न बिल्कुल सटीक था। चार सवाल पूछे थे। योगी ने पूंछा था कि आप एक हजार बसें चलवाना चाहती हैं,तो कांग्रेस शासित राज्यों से यूपी के श्रमिक पैदल क्यों आ रहे हैं। इतना ही नहीं पंजाब व राजस्थान से ट्राको में भरकर श्रमिक आ रहे थे। योगी ने कहा कि क्या कांग्रेस औरैया दुर्घटना की जिम्मेदारी लेगी। उनका आरोप था कि कांग्रेस श्रमिकों की सहायता का स्वांग कर है।</p>
<p>योगी ने यह आरोप एक दिन पहले लगाया था। प्रियंका गांधी के कार्यालय ने जो एक हजार बसों की सूची भेजी उससे योगी का आरोप ही प्रमाणित हो गया। प्रियंका द्वारा भेजी गई बसों की सूची में स्कूटर,आटो रिक्शा और तिपहिया वाहनों के साथ एंबुलेंस का नंबर शामिल है। उत्तर प्रदेश सरकार के प्रवक्ता सिद्धार्थनाथ सिंह ने कहा कि प्रियंका गांधी द्वारा भेजी गई सूची में जिन वाहनों के नंबर दिए गए हैं,उसमें अधिकांश ब्लैकलिस्टेड है। इस सूची में स्कूटर,आटो रिक्शा और तिपहिया वाहनों तक के नंबर शामिल हैं।</p>
<p>उन्होंने आरोप लगाया कि प्रियंका गांधी मजदूरों की भावनाओं के साथ खिलवाड़ कर रही हैं। कोरोना के संकटकाल में ओछी राजनीति करने की बजाए कांग्रेस को सरकार द्वारा किए जा रहे कार्यों में सहयोग करना चाहिए।प्रियंका गांधी की पहल से लगा था कि कांग्रेस दलगत राजनीति से ऊपर उठकर सहयोग करना चाहती है। प्रियंका गांधी ने श्रमिकों के लिए योगी सरकार से एक हजार बसें चलाने के लिये इजाजत मांगी थी। लेकिन प्रश्न तब भी उठा था कि वह एक हजार बसें पंजाब,दिल्ली, राजस्थान को क्यों नहीं दे रही है। जहां से श्रमिक पलायन कर रहे थे।</p>
<p>योगी सरकार ने भी उदारता से सहयोग की पेशकश स्वीकार की। अपर मुख्य सचिव अवनीश अवस्थी कांग्रेस से बसों की सूची मांगी थी। पहले ये बसें लखनऊ मंगाई गई थी। कहा गया था कि सभी बसों के चालकों के ड्राइविंग लाइसेंस, परिचालकों के परिचय पत्र और बसों के फिटनेस प्रमाण पत्र जिलाधिकारी लखनऊ को सौंप दें। इसी के साथ उनको अनुमति पत्र दे दिए जाएंगे। कांग्रेस की सुविधा को देखते हुए अवनीश अवस्थी ने दुबारा लिखा कि आप लखनऊ में बसें देने में असमर्थ हैं इसलिये पांच सौ बसें गाजियाबाद में उपलब्ध करा दें। बसों से जुड़ी सारी जानकारी जिलाधिकारी गाजियाबाद को दें। लेकिन इसी बीच सूची की गड़बड़ी उजागर हो गई।</p>
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		<title>रेलवे पटरी पर मिली रोटियाँ चीख रही, इमदाद की बातें फाज़िल हैं</title>
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		<pubDate>Sun, 17 May 2020 22:22:06 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<category><![CDATA[कोरोना]]></category>
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		<description><![CDATA[लाकडाउन का आदेश सुना, जनता की पीड़ा से, सरकार हो गयी गाफ़िल है। कोरोना मानव का ही नहीं, इसका वायरस व्यवस्था का भी कातिल है। ओपीडी खुलने का आदेश नहीं, नर्सिंग होम भी बन्दी में शामिल हैं। बिना डायलिसिस किडनी पेसेन्टों को, रोने के सिवा क्या हासिल है। जाँच परीक्षण सर्जरी बन्द हैं, वैसे तो &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_21404" style="width: 76px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/op-Yadav.jpg"><img class="  wp-image-21404" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/op-Yadav.jpg" alt="op Yadav" width="76" height="109" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>ओपी यादव</strong></figcaption></figure>
<p style="text-align: left">लाकडाउन का आदेश सुना, जनता की पीड़ा से, सरकार हो गयी गाफ़िल है।<br />
कोरोना मानव का ही नहीं, इसका वायरस व्यवस्था का भी कातिल है।</p>
<p style="text-align: left">ओपीडी खुलने का आदेश नहीं, नर्सिंग होम भी बन्दी में शामिल हैं।<br />
बिना डायलिसिस किडनी पेसेन्टों को, रोने के सिवा क्या हासिल है।</p>
<p style="text-align: left">जाँच परीक्षण सर्जरी बन्द हैं, वैसे तो डाक्टर बहुत ही काबिल हैं।<br />
बिना इलाज मरीज मर रहें, मजधार में डूबते को देखता साहिल हैं।</p>
<p style="text-align: left">परिवार छोड़ समाज की सेवा करते, कोरोना कर्मवीर जिन्दा दिल है।<br />
इन पर भी जो हमला करते, उनकी सोच तो बिल्कुल जाहिल है।</p>
<p style="text-align: left">क्या करियेगा इन बेगानों में भी, कुछ अपने ही शामिल है।<br />
दीवारों की इस साजिश में, दरवाजे भी शामिल हैं।</p>
<p style="text-align: left">महिला का बैल गाड़ी खींचना दर्शाता है कि, देश का सिस्टम काहिल हैं<br />
रेलवे पटरी पर मिली रोटियाँ चीख रही, इमदाद की बातें फाज़िल हैं।</p>
<p style="text-align: right"><em>ओपी यादव, पूर्व अध्यक्ष, सेन्ट्रल बार एसोसिएशन, रायबरेली।</em><br />
<em> मो0नं0: 9235833333</em></p>
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		<title>स्वदेशी की अलख जगाकर विश्वगुरू बन जाओ</title>
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		<pubDate>Wed, 13 May 2020 09:38:43 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[स्वदेशी आंदोलन महज स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं बल्कि विकासशील भारत की एक आर्थिक रणनीति का आधार था लखनऊ। कोविड-19 वायरस वैश्विक संकट बन कर उभरा है जिसने पूरी दुनिया को तबाह कर दिया है। इस संकट के समय हमें जीवन बचाना चाहिए और आगे बढऩा चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ऐसे आयामों &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>स्वदेशी आंदोलन महज स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं बल्कि विकासशील भारत की एक आर्थिक रणनीति का आधार था</strong></li>
</ul>
<figure id="attachment_21295" style="width: 106px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/pawan-tiwari.jpeg.jpg"><img class="  wp-image-21295" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/pawan-tiwari.jpeg.jpg" alt="pawan tiwari.jpeg" width="106" height="153" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>सीए पवन तिवारी</strong></figcaption></figure>
<p><strong>लखनऊ।</strong> कोविड-19 वायरस वैश्विक संकट बन कर उभरा है जिसने पूरी दुनिया को तबाह कर दिया है। इस संकट के समय हमें जीवन बचाना चाहिए और आगे बढऩा चाहिए। देश की अर्थव्यवस्था को बचाने के लिए ऐसे आयामों की खोज करनी है जिससे 21वीं सदी मे हम विश्व गुरू बनकर निकलें। हमें अपनी अर्थव्यवस्था को गति देने के लिए सहयोग की आवश्यकता है और यह सहयोग वित्तीय मदद के जरिए केन्द्र सरकार ने दिया है और अगले चरण में अर्थव्यवस्था को फिर से व्यवस्थित करने के लिए सभी उद्योगों को एक साथ आना पड़ेगा और भारत के सभी लोगों को अपने-अपने हिस्से की जिम्मेदारी निभानी होगी ।</p>
<p>हमे वापस से गांधीजी द्वारा चलाए हुए स्वदेशी आंदोलन को अपनाना होगा। स्वदेशी आंदोलन महज स्वतंत्रता आंदोलन का हिस्सा नहीं था, बल्कि विकासशील भारत की एक आर्थिक रणनीति का आधार था, जिसका उद्देश्य ब्रिटिश साम्राज्य को सत्ता से हटाना और स्वदेशी सिद्धांतों का पालन करके भारत में आर्थिक स्थितियों में सुधार करना था। अब यह आंदोलन अपने देश के घरेलू उत्पादों और उत्पादन प्रक्रियाओं को पुनर्जीवित करने के लिए करना होगा।</p>
<p>आमजन को भी भारतीय मूल की वस्तुओं की खरीदारी के लिए प्रतिबद्ध होना पड़ेगा। कृषि को नए उद्योग के रूप मे देखते हुए इस क्षेत्र का आधुनिकीकरण करना महत्वपूर्ण है, जिससे कामगार मजदूर जो अन्य राज्य से वापस आये हैं उन्हें रोजगार दिलाया जा सके साथ ही यह भी सुनिश्चित किया जाए की हमारे देश की आबादी खाद्य सुरक्षा का आनंद ले। कृषि प्रसंस्करण व्यवसायों की व्यावसायिकता को बढ़ाना और उत्पादन श्रृंखलाओं में विविधता लाना भी आज की जरूरत है।</p>
<p>एमएसएमई क्षेत्र अधिकतम रोजगार का अवसर प्रदान करता है इसलिए इस क्षेत्र के पुनरुद्धार के लिए आॢथक पुनरुद्धार बहुत आवश्यक है। आॢथक पुनरुद्धार पैकेज के रूप में प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी द्वारा घोषित अर्थव्यवस्था का 10 प्रतिशत मूल्य आॢथक पुनरुद्धार के लिए बहुत आवश्यक है, इस क्षेत्र को बढ़ावा देने के साथ 20 लाख करोड़ का पैकेज संजीवनी के रूप में काम करते हुए जहां एक तरफ अर्थव्यवस्था को स्वस्थ्य करेगा, वही दूसरी ओर यह रोजगार के अवसर भी पैदा करेगा।</p>
<p style="text-align: right"><strong><em>लेखक आर्थिक मामलों के विशेषज्ञ हैं।</em></strong></p>
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		<title>कोरोनामिक्स: उम्मीद का नया अर्थशास्त्र</title>
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		<pubDate>Mon, 11 May 2020 21:11:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[कोरोना महामारी केवल कुछ समय के लिए अर्थशास्त्र की दशा को बदलने नहीं जा रही है, कोरोना नया इकोनोमिक्स बनाने जा रही है कोरोनामिक्स। यह कोरोनामिक्स अर्थव्यवस्था पर तब तक शासन करेगा जब तक कि इसके लिए दवा न विकसित हो जाए हो और लोगों के दिल में जैविक युद्ध की आशंका न खत्म हो &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<figure id="attachment_21163" style="width: 152px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/04/B1EEBA13-936B-4B0D-9625-A07A647926FB.jpeg"><img class="  wp-image-21163" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/04/B1EEBA13-936B-4B0D-9625-A07A647926FB.jpeg" alt="B1EEBA13-936B-4B0D-9625-A07A647926FB" width="152" height="231" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>पंकज जायसवाल</strong></figcaption></figure>
<p>कोरोना महामारी केवल कुछ समय के लिए अर्थशास्त्र की दशा को बदलने नहीं जा रही है, कोरोना नया इकोनोमिक्स बनाने जा रही है कोरोनामिक्स। यह कोरोनामिक्स अर्थव्यवस्था पर तब तक शासन करेगा जब तक कि इसके लिए दवा न विकसित हो जाए हो और लोगों के दिल में जैविक युद्ध की आशंका न खत्म हो जाए। इस कोरोनामिक्स को जानने के लिए आइए कोरोना महामारी के कुछ तथ्य पर चर्चा करते हैं । आज आवश्यक वस्तुओं को छोड़कर अधिकांश वस्तुओं और सेवाओं की बिक्री नहीं के बराबर है, इसलिए जीडीपी लगभग शून्य और विकास नकारात्मक है। लगभग सभी व्यवसाय आवश्यक सामान के उद्योग को छोड़कर सकल हानि का सामना कर रहे हैं। आपूर्ति श्रृंखला अंतिम छोर तक प्रभावित है।</p>
<p>विश्व बैंक ने भी कह दिया कि जीडीपी भारत और संपूर्ण एशिया के लिए शून्य होगा। अगले साल की विकास दर 1.8 प्रतिशत आंकी गई और यदि 7 प्रतिशत की विकास दर चाहिए तो लगातार तीन वर्ष तक 8.5 प्रतिशत की उच्च विकास दर चाहिए होंगे। दुनिया भर में 160 करोड़ लोगों के बेरोजगारी का अनुमान लगाया जा रहा है। भारत में 11 करोड़ एमएसएमई प्रभावित हैं। सभी सरकारी लक्ष्य और रेटिंग समाप्त हो गए हैं। सभी बजट आवंटन पूरे नहीं किए जा पा रहे हैं सारा फोकस स्वास्थ्य इन्फ्रा पर आ गया है। भारत में प्रति दिन नुकसान 4.5 बिलियन डॉलर हो गया है और लॉकडाउन एक में जहाँ उच्च स्तर के बिजनेस एविएशन और हॉस्पिटैलिटी बुरी तरह से प्रभावित हुए हैं तो अंतिम स्तर पर नाई और सैलून बुरी तरह प्रभावित हुआ है। हालाँकि ये तथ्य हमें नकारात्मक संकेत देते हैं लेकिन फिर भी, भारत के लिए बहुत सारी उम्मीदें और सकारात्मक संकेत हैं।</p>
<p>शेष विश्व की तुलना में भारत में आबादी के आकार और जटिल संरचना के अनुपात में प्रसार और मृत्यु की दर धीमी है। हालांकि संक्रमण का सम्पूर्ण स्तर पर परीक्षण और मापन नहीं हो पाया है तिस पर भी मृत्यु औसत दर से बहुत कम और नियंत्रण में है, शेष विश्व के मुकाबले। भारत में परीक्षण की कमी के कारण एक बड़ी आबादी बड़े पैमाने पर संक्रमण से अनजान हैं, टेस्ट नहीं हो पा रहें हैं लेकिन लगभग हर शहरी मृत्यु रिकॉर्ड में हैं और फिर भी कोरोना से मृत्यु बहुत कम है, कारण भारतीयों की प्रतिरक्षा प्रणाली अच्छी तरह से लड़ रही है।</p>
<p>अर्थव्यवस्था और समाज के लिए, यह उछाल लेकर वापसी करने का समय है विशेषकर उनके लिए जो विकास की दौड़ से वंचित और पिछड़ गए थे। इस संकट ने नए नेतृत्व विकास को उभरने के लिए भी एक जगह बनाई है, यह व्यक्तिगत स्तर पर भी लागू है और वैश्विक स्तर पर भी। पृथ्वी और अर्थव्यवस्था दोनों रीसेट मोड में हैं, यह परिवर्तन विकास की दौड़ में पिछड़ गए और वंचित रह गए आबादी को अधिक संभावना देगी, यह उनके लिए अवसर हो सकता है। कौशल के विकेंद्रीकरण से क़स्बे के स्तर पर आर्थिक गतिविधियां तेज होंगी और पूरे भारत में समान गति और स्तर से विकास संभव होगा और आर्थिक तानाबाना मजबूत होगा। नौकरी से निकाल दिए गए लोग स्वरोजगार शुरू करेंगे और वे सलाहकार पेशेवरों जैसे की सीए,अधिवक्ताओं और अन्य सेवा प्रदाताओं के लिए अवसर पैदा करेंगे।</p>
<p>बैंक और वित्तीय संस्थान और ऋण देने के लिए मजबूर होंगी, क्योंकि इस अवधि के दौरान ऋण वितरण नहीं हो पाया है। सरकार एमएसएमई और प्रभावित क्षेत्र को कई पैकेज देगी। सरकारी खरीद और व्यय में वृद्धि होगी। भारत विश्व में पुनः आउटसोर्सिंग हब हो सकता है। आउटसोर्सिंग के लिए लिस्टिंग पहले से ही इस प्रक्रिया में है जिसमें कौन सा काम काम घर से और कौन सा हाइब्रिड सिस्टम में हो सकता है इसपर मंथन चालू हो गया है, यह बदलाव ऑपरेटिंग लागत को कम करेगा और लाभ बढ़ाएगा। लॉकडाउन में घटे वेतन और आय ने बचत की आदत और फालतू खर्चों में कमी की आदत डाल दी है।</p>
<p>वैश्विक स्तर पर, खरीदार पहले से ही भारत से चीनी मिट्टी के बरतन, घर, फैशन और जीवन शैली के सामानों की खरीददारी कर रहें हैं और अब यह गति बढ़ेगी। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर विकल्प के रूप में भारत कच्चे माल और निर्मित वस्तुओं के आपूर्तिकर्ता के रूप में कई व्यापार चैनलों में प्रवेश कर सकता है। बदलती विश्व अर्थगति और नई अंतर्राष्ट्रीय आपूर्ति श्रृंखला मॉडल में, भारत महत्वपूर्ण स्थान रखता है। भारत चीन से निकल रहे और लगभग एक हजार विदेशी निर्माताओं को भारत में उत्पादन संयत्र को स्थानांतरित करने के लिए आमंत्रित करने में लगा है। वे भारत को चीन के विकल्प के रूप में देख भी रहें हैं। कथित तौर पर, कम से कम 300 कंपनिया पहले से ही इलेक्ट्रॉनिक्स, चिकित्सा और कपड़ा सहित कई क्षेत्रों में उत्पादन के लिए भारत सरकार के साथ बात कर रहीं हैं।</p>
<p>विनिर्माण सुविधाओं के वृद्धि होने पर आसपास ढांचागत विकास , स्थानीय अर्थव्यवस्था और रोजगार को बढ़ावा मिलेगा। इस वर्ष, सरकार 300 से अधिक उत्पादों पर आयात शुल्क बढ़ाने का सोच रही है, और ऐसे देशों को चिन्हित कर रही है जो करीब 1000 वस्तुओं की आपूर्ति के लिए चीन से इतर सोच रहें हैं । महामारी ने उपभोक्ता मनोविज्ञान में भी बदलाव किया है, और यह बाजार के प्रति, विशेष रूप से चीन और उसके उत्पादों के प्रति एक परिवर्तित व्यवहार सामने लायेगा । इससे कोई इनकार नहीं कर रहा है कि, महामारी को देखते हुए, आपूर्ति श्रृंखला पर सबसे बड़ी मार पड़ी है और भारत को इस वैश्विक शून्य को भरने के लिए छलांग लगाने से पहले अपनी निर्भरता को चीन पर से काफी कम करना होगा क्यों कि लंबे समय से, चीन विभिन्न वस्तुवों के लिए भारत की आयात सूची में सबसे ऊपर है।</p>
<p>कोरोना काल के बाद कैसे सेक्टरों के विकास पहले से स्थापित कई नकारात्मकताओं को प्रतिस्थापित करेंगे और पूर्व निर्मित विकास के अंतर को भरेंगे । इस दौर के बाद एग्रो इकोनॉमी ही विश्व स्तर पर लीड करेगी, इस दौर में लोगों ने आवश्यक खाद्य पदार्थों, प्रिवेंटिव स्वास्थ्य बाजार (आयुर्वेद, योग और होमियोपैथ) को महसूस किया है और यह इस सेगमेंट के लिए एक अवसर होगा। आर्थिक गतिविधियों के विकेंद्रीकरण से माइक्रो सेक्टर बढ़ेगा और नए और पहले से अधिक मजबूत आर्थिक ताने-बाने का निर्माण होगा। हेल्थ इन्फ्रास्ट्रक्चर और ई-कॉमर्स, लॉजिस्टिक सेक्टर में वृद्धि होगी। एविएशन हॉस्पिटैलिटी एवं एंटरटेनमेंट सेक्टर प्रभावित होगा जहां भीड़ ज्यादे होती है लेकिन पोजिटिव यह है की लोग मनोरंजन के अन्य माध्यमों की ओर रुख करेंगे और उद्योग उस ओर बढ़ेगा। हां, एविएशन और हाई-क्लास हॉस्पिटैलिटी सेक्टर को कोरोना के बाद संभलने और पुनः पूर्व आकार लेने में समय लगेगा।</p>
<p>यह भी स्पष्ट है की विश्व स्तर पर बदल रही गतिशीलता में चीन पर निर्भरता शायद खत्म हो रही है, आशंका है की उसका दबदबा खत्म करने या कोरोना के दंड के रूप में चीन पर परमाणु बम से हमला हो जाए या चीन को तोड़ने के लिए साइलेंट हमला हो या शीत युद्ध जैसी परिस्थितियां हो जाए, हालाँकि ये सब अतिवाद संभावनाएं हैं फिर भी दुनिया की शीर्ष 10 अर्थव्यवस्था की लिस्ट बदलेगी और कुछ नए देश आयंगे और पुराने जायेंगे । संयुक्त राष्ट्र और डब्ल्यूएचओ की भूमिका की भी समीक्षा की जाएगी<br />
उपरोक्त सभी सकारात्मक आशाओं का लाभ प्राप्त करने के लिए सरकार की मजबूत इच्छाशक्ति की आवश्यकता है। एमएसएमई से सरकारी खरीद को बढ़ाकर 50 प्रतिशत किया जाना चाहिए और इसमें से भी 50 प्रतिशत माइक्रो सेक्टर से खरीदना चाहिए। एमएसएमई को तीन-भाग सूक्ष्म, लघु और मध्यम में अलग-अलग तीन प्रकोष्ठ के नेतृत्व में विभाजित करना चाहिए ताकि माइक्रो के साथ न्याय हो सके।</p>
<p>सरकार को अंतिम स्तर पर बिक्री संभव बनाने और खपत बढ़ाने का प्रयास करना चाहिए। बैंक के लाभ की समीक्षा की आवश्यकता है और बैंक ब्याज और बैंक शुल्क में कमी इस समय की मांग है। कम ब्याज दर के साथ अधिस्थगन की अवधि और सभी इन्फ्रास्ट्रक्चर खर्च बढ़ाए जाने चाहिए । बजट की बात करें तो कोरोना के कारण अधिकांश बजट आवंटन बदल जायेगा और यह अब मानव संसाधन के बचाव, विकास एवं स्वास्थ्य सेवा के बुनियादी ढांचे के विकास पर स्थानांतरित हो जाएगा। पारित किए गए सभी बजट और सरकारी खर्चों की समीक्षा, पुनर्गणना और फिर से नवीन आवंटन किया जाना चाहिए क्यूँ की इस कोरोना ने बजट के खर्चों की प्राथमिकता और उनकी अवधि मटेरियल रूप से बदल दी है।</p>
<p><span lang="HI">व्यक्तिगत स्तर पर भी हमारे पास करने को कई चीजें हैं और अवसर भी हैं ।</span> <span lang="HI">हम अपने लंबे समय से लंबित स्वास्थ्य योजना को पूरा कर सकते हैं।</span> <span lang="HI">हम उन सभी कार्यों को पूरा कर सकते हैं जो कार्यालय जाने या काम में व्यस्त रहने के कारण टालते आये थे।</span> <span lang="HI">अब हम व्यय पुनर्गठन और लागत में कमी को संभव कर सकते हैं ।</span> <span lang="HI">मध्यम वर्ग कोरोना के बहाने ही भव्य और अनावश्यक खर्च को कम कर सकता है। लगातार लॉकडाउन ने हमें अनुशासन सीखा दिया है हम लॉकडाउन के दिशानिर्देशों और कोरोना के बाद आने वाले आर्थिक पर्यावरण के अनुसार काम का पुनर्गठन कर सकते हैं।</span> <span lang="HI">इस कोरोनामिक्स से लड़ने के लिए हमें अपने</span> <span lang="HI">व्यावसायिक रणनीति में</span> <span lang="HI">सभी सीमाओं</span>, <span lang="HI">शर्म</span> <span lang="HI">और अहंकार</span> <span lang="HI">को भी खोलना चाहिए</span> <span lang="HI">।</span> <span lang="HI">कोरोनामिक्स के इन अनुप्रयोगों  से हम अर्थव्यवस्था और मानव जीवन के दुश्मन कोविड </span>19 <span lang="HI">को हरा सकते हैं।</span></p>
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