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	<title>Business Link &#187; उद्योग</title>
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		<title>संवाद कार्यक्रम में बोले उद्यमी, बिना बिक्री के उत्पादन से कोई लाभ नहीं </title>
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		<pubDate>Tue, 28 Apr 2020 19:00:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[इंडस्ट्री]]></category>
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		<description><![CDATA[उद्योगपतियों-कारोबारियों से लॉकडाउन पर औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने की चर्चा  बंदी की वजह से तीन महीने का लीज़ रेंट व अन्य शुल्क माफ़ करने की उद्यमियों ने की मांग  बिजली के बिलों में स्थाई शुल्क माफ़ करके मीटर रीडिंग के आधार पर भुगतान लेने का किया अनुरोध बिज़नेस लिंक ब्यूरो लखनऊ। पीएचडी चैंबर ऑफ़ &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>उद्योगपतियों-कारोबारियों से लॉकडाउन पर औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने की चर्चा </strong></li>
<li><strong>बंदी की वजह से तीन महीने का लीज़ रेंट व अन्य शुल्क माफ़ करने की उद्यमियों ने की मांग<span class="Apple-converted-space"> </span></strong></li>
<li><strong>बिजली के बिलों में स्थाई शुल्क माफ़ करके मीटर रीडिंग के आधार पर भुगतान लेने का किया अनुरोध</strong></li>
</ul>
<p><strong>बिज़नेस लिंक ब्यूरो</strong></p>
<p><strong>लखनऊ।</strong> पीएचडी चैंबर ऑफ़ कॉमर्स ने वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिंग के माध्यम से औद्योगिक इकाइयों की विभिन्न समस्याओं के समाधान के लिये संवाद कार्यक्रम आयोजित किया। इस संवाद कार्यक्रम में उद्योगपतियों और कारोबारियों की विभिन्न समस्याओं को औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना और शीर्ष विभागीय अधिकारियों ने सुना एवं सम्भव समाधान का आश्वासन दिया।<span class="Apple-converted-space"> </span></p>
<p>इस संवाद कार्यक्रम में सभी कारोबारी और उद्यमी इस बात पर एकमत रहे कि फैक्ट्रियों से पहले बाज़ार को खोला जाए। अन्यथा बिना बिक्री के उत्पादन से कोई लाभ नहीं होगा। साथ ही उप्र के औद्योगिक इलाक़ों में बंदी की वजह से तीन महीने का लीज़ रेंट व अन्य शुल्क माफ़ करना व बिजली के बिलों में स्थाई शुल्क माफ़ करके मीटर रीडिंग के आधार पर भुगतान लेने का अनुरोध भी किया गया। सरकार द्वारा यह कहा गया है कि फैक्ट्री के स्टाफ़ के घर आने जाने की व्यवस्था फैक्ट्री मालिक को करनी होगी। व्यवहारिक न होने के कारण इस आदेश को भी उद्योग मंत्री से निरस्त करने का अनुरोध किया गया।<span class="Apple-converted-space"> </span></p>
<p>औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने उत्तर प्रदेश के प्रमुख उद्योगपतियों व कारोबारियों से कोरोना की मौजूदा चुनौतियों पर चर्चा के दौरान उनकी समस्याएं सुनीं व सुझावों पर शीघ्र समाधान का भरोसा दिलाया। इस महत्वपूर्ण वार्ता में शीर्ष विभागीय अधिकारियों ने हिस्सा लिया। औद्योगिक विकास आयुक्त व नोएडा अथॉरिटी के चेयरमैन आलोक टंडन और उप्र राज्य औद्योगिक विकास अथॉरिटी के सीईओ अनिल गर्ग ने उद्यमियों की समस्याएं सुनीं व सरकार का पक्ष रखा। कारोबार से जुड़े सरोकारों व समस्याओं के त्वरित निदान की सरकार की इस शैली को सभी ने सराहा।<span class="Apple-converted-space"> </span></p>
<p>औद्योगिक विकास मंत्री सतीश महाना ने कहा कोरोना से देश स्वास्थ्य के साथ-साथ गंभीर आर्थिक संकट से भी जूझ रहा है। कारोबारियों और सरकार के बीच बेहतर सामंजस्य से हम कोरोना की यह जंग जीत सकते हैं। सरकार कारोबारियों की हर संभव मदद के लिए तैयार है। वीडियो कॉन्फ़्रेन्सिंग के माध्यम से यह संवाद कार्यक्रम पीएचडी चैंबर ऑफ़ कॉमर्स ने आयोजित किया। इस दौरान पीएचडी चैंबर के यूपी चैप्टर चैयरमैन व गौड संस के मनोज गौड समेत जयपुरिया समुह के शरद जयपुरिया, कजारिया टाइल्स के अशोक कजारिया, केंट आरओ के महेश गुप्ता, सलोरा समुह के गोपाल जीवराजका, रैडिको खेतान के ललित खेतान, केएम शुगर मिल के एल के झुंनझुनवाला व उप्र के अनेक उद्योगपति, प्रमुख कारोबारी व उद्योग संगठनों के प्रतिनिधियों ने इस संवाद में हिस्सा लिया।</p>
<p>पीएचडी चैंबर यूपी चैप्टर के को-चेयरमैन मनीष खेमका ने कहा, वैबिनार के नतीजे वास्तविक सेमिनार या कार्यक्रम से ज्यादा प्रभावी रहे। इसमें भारत के साथ-साथ बड़ी संख्या में ब्रिटेन, थाईलैंड, कनाडा व जापान जैसे देशों में रह रहे उत्तर प्रदेश के प्रवासी नागरिकों ने भी अपनी समस्याओं व सुझावों को साझा किया। इस वेबिनार में कनाडा में प्रवासी भारतीय कारोबारियों की सबसे बडी संस्था इंडो कैनेडियन चैंबर ऑफ़ कॉमर्स के नेशनल प्रोसिडेंट प्रमोद गोयल, ओवरसीज़ फ़्रेंड्स ऑफ़ बीजेपी के यूके प्रेसिडेंट कुलदीप शेखावत, लंदन से अजय अग्रवाल, सुमित जालान, मधुरेश मिश्रा, थाईलैंड से डा. अलका गुप्ता, जापान से डा. सुशील यामामोतो समेत पीएचडी यूपी के को चेयरमैन गौरव प्रकाश, रंजित मेहता, अतुल श्रीवास्तव व अनेक महत्वपूर्ण व्यक्तियों ने हिस्सा लिया।<span class="Apple-converted-space"> </span></p>
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		<title>सूरत की घटना : उद्यम बनाम मजदूर संघर्ष की प्रस्तावना</title>
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		<pubDate>Tue, 14 Apr 2020 08:06:25 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Breaking News]]></category>
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		<description><![CDATA[पंकज जायसवाल सूरत में मजदूरों का मिल मालिक के खिलाफ विद्रोह कोरोना की तरह ही पहली चिंगारी है जिसे सभी सरकारों को ध्यान देने की जरूरत है। समय के साथ वेतन न मिलने की घटनाएं बढ़ती जाएंगी। अप्रैल माह में बिक्री कुछ अत्यावश्यक वस्तुवों को छोड़ बिक्री शून्य है, मई में वेतन समेत अन्य स्थाई &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li style="font-weight: 400"><strong>पंकज जायसवाल</strong></li>
</ul>
<h3 style="font-weight: 400">सूरत में मजदूरों का मिल मालिक के खिलाफ विद्रोह कोरोना की तरह ही पहली चिंगारी है जिसे सभी सरकारों को ध्यान देने की जरूरत है। समय के साथ वेतन न मिलने की घटनाएं बढ़ती जाएंगी। अप्रैल माह में बिक्री कुछ अत्यावश्यक वस्तुवों को छोड़ बिक्री शून्य है, मई में वेतन समेत अन्य स्थाई खर्चों के भुगतान का वक़्त आ रहा है. जून माह में भयंकर संकट और भयंकर विद्रोह की भी आशंका है, जब मिल मालिकों को जून माह में मार्च से लेकर जून माह मतलब 4 माह का इकट्ठे कॅश क्रेडिट ऋण का एवं ओवरड्राफ्ट ऋण का ब्याज देना है, और लगभग सारे टैक्स की तारीख जून कर दी गई है। न तो  सरकार ने टैक्स माफ किया है और ना ही ब्याज सिर्फ उसे  स्थगित किया गया है, जिस पर ब्याज की लागत भी उद्यमी को वहन करना है। मार्च माह से अति जीवनावश्यक चीजों को छोड़ लगभग 95% उद्योगों की बिक्री शून्य है,एक पैसा खाते में नहीं आया है, मई तक भी आने की उम्मीद नहीं है, पुराना बकाया भी नही मिल रहा, जून की बिक्री का पैसा भी तुरन्त नहीं मिलने वाला, क्यों कि ज्यादेतर खरीददार खुद नगदी संकट में होंगे, ऐसे में मासिक वेतन व मजदूरी का भुगतान, मार्च में एक साथ 4 माह का कार्यशील ऋण का ब्याज, ज्यादेतर टैक्स और कंप्लायंस का इकट्ठा बोझ उद्यमियों की कमर तोड़ेंगे, अगर रोका नहीं गया इसे तो हो सकता है कि मजदूरों कर्मचारियों और उद्यमियों के बीच भी संघर्ष के पटकथा की  ज़मीन तैयार हो जाए।</h3>
<p>कोरोना का यह संक्रमण अगर लम्बा चला तो सबसे अधिक मार खायेगा मध्य वर्ग और एमएसएमई सेक्टर, उच्च आय वर्ग के पास तो खुद का धन है, गरीबों का राशन और ख्याल सरकार रख रही है लेकिन मध्य वर्ग ना तो राशन के लिए कतार में लग सकता है ना ही खुले तौर पर अपनी व्यथा कह सकता है, अपने दिल में दर्द की चिंगारी वह लेकर बैठा है, और तब तक बैठा है जब तक पानी सर से ऊपर नहीं चला जाता है, सरकार को चाहिए की वह इस स्थिति को भांपे और पानी को सर के ऊपर से नहीं जाने दे, कोरोना के इस जंग में सब सरकार के साथ हैं सबको सरकार पर भरोसा है और सबको सरकार के द्वारा लिए गए कदम से संतोष है, चिंता है तो बस यही की इकॉनमी का क्या होगा जब यह बंदी पूरी तरह से खुलेगा, क्यूँ की इस प्राकृतिक आपदा पर तो विश्व के किसी भी सरकार का वश नहीं चल रहा, ऐसे में इकॉनमी तो सिर्फ एक हिस्सा है.</p>
<p>एमएसएमई सर्विस सेक्टर, मैन्युफैक्चरिंग सेक्टर एवं ट्रेडिंग सेक्टर के पास उतना शॉक अब्जोर्बेर नहीं होता की लगातार इस झटके से  उबर ले. इनके आयार्जन की क्षमता काफी घट गई है, कुछ स्थाई खर्चे ऐसे हैं जिन्हें आय हो न हो खर्च करना ही है. इस वर्ग के सामने सबसे बड़ी चिंता है की इस लॉक डाउन में और आगे भी अपने स्टाफ एवं मजदूरों को वेतन कहाँ से दे, सरकारों का फरमान आ रहा है की वेतन देना है, लेकिन एमएसएमई के पास यदि पैसा ही न हो, बिक्री शून्य हो, ऋण मिलने वाला नहीं है साइकिल रुकी हुई है तो वह दें तो दें कहाँ से . जितने भी एमएसएमई हैं कहीं न कहीं वह बड़े इंटरप्राइजेज पर ही निर्भर हैं और बड़े इंटरप्राइजेज के ऊपर पड़ी मार का भार आज भी और आगे भी इनके उपर ही आने वाला है, देनदारी वसूली के साथ साथ एमएसएमई के कॉन्ट्रैक्ट की साइज़ या मूल्य कम होने की सम्भावना है .</p>
<p>लॉक डाउन में मजदूरों और सप्लाई चेन की समस्या तो है ही, लॉक डाउन के बाद मटेरियल और मजदूरों की अनुउपलब्धता, ग्राहक व्यवहार में परिवर्तन, रेट कट का दबाब, उत्पादन बंद करने की नौबत, नकदी संकट,एक साथ ब्याज और टैक्स पेमेंट का संकट, सप्लाई चेन का संकट आदि से दो चार होना है. एमएसएमई का धंधा कम होने पर अंत में मार मध्य वर्ग के  वेतनभोगियों पर ही पड़ेगी. और एक बार जब यह मार पड़ेगी तो सूरत की तरह उद्यमी और मजदूर आमने सामने भी खड़े हो सकते हैं. ऐसी परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए जितने भी औद्योगिक संगठन है जिसमें असोचैम, फिक्की, पीएचडी चैम्बर और खासकर के एमएसएमई के लिए कार्य कर रही संस्था लघु उद्योग भारती और  स्माल इंडस्ट्रीज एंड मैन्युफैक्चरिंग एसोसिएशन ( सीमा) हो सबको आगे आकर इन चिंताओं का समाधान ढूंढने में सरकार की मदद करनी पड़ेगी. इस संकट की घडी में यह अब सिर्फ सरकार की जिम्मेदारी नहीं रह गई है, यह इन संगठनों की भी जिम्मेदारी हो गई है की अपने उत्तरदायित्व का निर्वहन करें और हल ढूंढने में मदद करें.</p>
<p>मेरा मत है कि सरकार को वेज सब्सिडी, बिजली फिक्स्ड चार्ज की ६ माह तक माफ़ी, सिर्फ प्रयोग में लाये गए बिजली पर ही बिल, भरे गए टैक्स के बराबर प्रतिभूति रहित ऋण, एनपीए नियमों में राहत, एन सी एल टी में राहत, एमएसएमई से सरकारी खरीद की सीमा को 50 प्रतिशत तक किया जाए, पुराने सरकारी बकायों का भुगतान निर्गत , कंप्लायंस में राहत सितम्बर तक बढाया जाए. ऋण लेना सुगम बनाया जाय, मोरेटेरियम 6 माह तक , ब्याज का भार सिर्फ ईएमआई राशि पर बजाय पूरे बकाये राशि के, कर्जमाफी की जगह ब्याजमाफी का विकल्प या सभी तरह के ऋणों पर ब्याज दर कम करने का प्रस्ताव, बैंकों द्वारा अनावश्यक कई तरह के चार्ज एवं पेनल ब्याज हटाने जैसे कदम लेने चाहिए. सबसे अधिक प्रभावित सेक्टर टूरिस्ट, एविएशन, ऑटोमोबाइल, इलेक्ट्रॉनिक, इन्फ्रा, निर्माण, सप्लाई चेन आदि पर विशेष पैकेज या इंडस्ट्री के हिसाब से टैक्स हॉलिडे भी लाया जा सकता है. मेरा यह भी मत है की सरकार का भी राजस्व प्रभावित होगा, ऐसे में राजकोषीय घाटा कम करने हेतु पीएम केयर फंड फंड को टैक्स पेमेंट या सरकारी बांड से लिंक कर टैक्स कलेक्शन का अग्रिम संग्रह कर लेना चाहिए.</p>
<p>सरकार को एक अध्ययन कमेटी बनानी चाहिए जो एक निष्कर्ष रिपोर्ट दे की लॉक डाउन की स्थिति में कैसे और किन विधियों का पालन करते हुए  उद्योग एवं सरकारी विभाग काम कर सकते हैं, उनके कार्य करने के तरीके और संस्कृति क्या हो, हो सकता है हम ऐसी कार्य संस्कृति इस महामारी में विकसित कर लें की वह औद्योगिक, सामाजिक, पारिवारिक और प्रकृति सब के अनुकूल हो. लॉक डाउन एक अवस्था है, और ऐसा नहीं है की विश्व में मानव का दिमाग यह विधि न विकसित कर ले की ऐसी परिस्थिति में उद्यम कैसे करें. जब मानव अन्तरिक्ष में भी कार्य करने की विधि विकसित कर चुका है तो यह तो एक लॉक डाउन है, और यदि इस डर के आगे हमने विधि विकसित कर लें तो डर के आगे जीत है.</p>
<p>साथ में सरकार को ध्यान देना चाहिए कि मजदूरों के पलायन के बाद उच्च वेतन और पेशेवरवर्ग का भी पलायन हो सकता है, कॉर्पोरेट अपने हानि का बहुत सा भार इनके खर्चे को कम करके करना चाहेंगे ऐसे में हो सकता है की मजदूरों के बाद कर्मचारी और बाद में पेशेवर का पलायन शुरू हो. हालांकि मजदूर या पेशेवर पलायन का दूसरा पहलू ये भी है कि तब उद्यम और रोजगार का केन्द्रीयकरण नहीं विकेंद्रीकरण होगा और कस्बों का विकास देखने को मिलेगा, जो शहरीकरण से कहीं बेहतर हो और गांवो के विकास में सहायक होंगे.</p>
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