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	<title>Business Link &#187; बिहार</title>
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		<title>पुलिसिया बर्बरता के बाद सहमे छात्र</title>
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		<pubDate>Fri, 28 Jan 2022 17:54:53 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[प्रयागराज के बघाड़ा इलाके में मंगलवार शाम प्रतियोगी छात्रों के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने लॉज के कमरों में घुसकर क्रूरता से पीटा था। पुलिस की इस कार्रवाई का डर छात्रों पर तीन दिन बाद भी बना हुआ है। लॉजों के ज्यादातर कमरों में ताला लटका हुआ है। दूर-दराज के इक्का-दुक्का छात्र ही कमरों में &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<p>प्रयागराज के बघाड़ा इलाके में मंगलवार शाम प्रतियोगी छात्रों के प्रदर्शन के बाद पुलिस ने लॉज के कमरों में घुसकर क्रूरता से पीटा था। पुलिस की इस कार्रवाई का डर छात्रों पर तीन दिन बाद भी बना हुआ है। लॉजों के ज्यादातर कमरों में ताला लटका हुआ है। दूर-दराज के इक्का-दुक्का छात्र ही कमरों में अंदर से ताला बंद कर डर-सहमे, दुबके हुए हैं। पुलिस ने जिस क्रूरता से कमरों से छात्रों को बाहर घसीटकर पीटा था, उस मंजर को याद कर छात्रों की रूह कांप जाती है।</p>
<p>छोटा बघाड़ा मिश्रा लॉज में रहने वाले बिहार के विनीत यादव ने बताया कि टीजीटी-पीजीटी की तैयारी करते हैं। मंगलवार शाम वह कमरे में थे। अचानक बाहर शोरगुल मचा। हम डर गए। लगभग आठ-दस पुलिस वाले आए और कमरे का दरवाजा लाठी और बूटों से पीटकर तोड़ने लगे। खिड़कियों के कांच तोड़ दिए। कुछ कमरों का दरवाजा तोड़ दिया और छात्रों को बर्बर तरीके से पीटा। चीख पुकार सुनकर तख्त को दरवाजे से सटाकर हम लोग चुपचाप नीचे छिपे रहे।</p>
<p>आधे घंटे सन्नाटा पसरा रहने के बाद साथियों से फोन पर पता किया और चुपचाप सहपाठी के साथ माघ मेला क्षेत्र में निकल गए। रात भर मेले में घूमते रहे। हम लोग सुबह भी कमरे पर आने की हिम्मत नहीं जुटा पाए। शाम को जब साथियों से पता चला कि एसएसपी आए थे और उन्होंने छात्रों से शांति बनाए रखने की अपील की है और आश्वासन दिया है कि किसी छात्र को परेशान नहीं किया जाएगा। तब हम लोग कमरे पर आए।</p>
<p>इसी लॉज में एसएससी की तैयारी करने वाले जौनपुर निवासी राजेश ने बताया कि जो छात्र प्रदर्शन में शामिल थे। वह तो पहले ही भाग चुके थे। कमरे में तो वहीं छात्र थे, जिनका आंदोलन से कोई लेना देना नहीं था। लेकिन पुलिस ने बेगुनाह छात्रों को पीटा। लॉज में कई छात्र इंटर की पढ़ाई करने वाले हैं। पुलिस ने उनको भी नहीं बख्शा है।</p>
<p>बिहार के कैमूर जिले के विनोद कुमार ने बताया छात्र अपनी बात जिम्मेदार अफसरों तक पहुंचाने के लिए सांकेतिक प्रदर्शन कर रहे थे। आखिर छात्र अपनी बात किस तरह जिम्मेदार अफसरों तक पहुंचाएं। हम यहां पढ़ने के लिए आए हैं। उपद्रव करने नहीं आए हैं। लेकिन पुलिस ने छात्रों के साथ उपद्रवियों सा सलूक किया। जो छात्र आसपास के जिलों के रहने वाले हैं। वह घर चले गए हैं। जो दूरदराज के हैं, वही छात्र रुके हुए हैं।</p>
<p>लॉज के कमरों में रुके हुए छात्र बाहर जरा सी भी आहट पर सहम उठते हैं। वह कमरे से बाहर निकलने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहे हैं। इन छात्रों का कहना है कि घर दूर होने और शहर में दूसरा कोई ठिकाना न होने के कारण लॉज में रुकने की मजबूरी है। वरना इस माहौल में वह भी ताला बंद कर चले जाते और माहौल सामान्य होने पर ही लौटते।</p>
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		<title>लॉकडाउन में साइकिल की सवारी बनी घरवापसी की सशक्त साधन</title>
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		<pubDate>Wed, 13 May 2020 16:13:52 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[नहीं मिली सरकारी मदद, मजदूरों ने घरवापसी के लिये घर से पैसा मंगाकर खरीदी 24 साइकिलें संबंधित अधिकारियों व पुलिस थाने पर मदद के लिये लगाई गुहार, नतीजा निकला शून्य मजबूरी का दंश झेल रहे मजदूर रायबरेली से सपरिवार साइकिल से ही निकले झारखण्ड और बिहार सुल्तानपुर। अशिक्षा, निर्धनता, विवशता और जागरूकता की कमी ही &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>नहीं मिली सरकारी मदद, मजदूरों ने घरवापसी के लिये घर से पैसा मंगाकर खरीदी 24 साइकिलें </strong></li>
<li><strong>संबंधित अधिकारियों व पुलिस थाने पर मदद के लिये लगाई गुहार, नतीजा निकला शून्य </strong></li>
<li><strong>मजबूरी का दंश झेल रहे मजदूर रायबरेली से सपरिवार साइकिल से ही निकले झारखण्ड और बिहार</strong></li>
</ul>
<figure id="attachment_21370" style="width: 116px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/santosh-yadav.jpg"><img class="  wp-image-21370" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/santosh-yadav.jpg" alt="santosh yadav" width="116" height="144" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>संतोष कुमार यादव</strong></figcaption></figure>
<p><strong>सुल्तानपुर।</strong> अशिक्षा, निर्धनता, विवशता और जागरूकता की कमी ही मजदूरों की मजबूरी है। यही मजबूरी बिहार और झारखंड राज्यों से रोजी-रोटी कमाने आये मजदूरों को लॉकडाउन में भारी पड़ रही है। लम्बे समय तक जब सरकारी राहत नसीब नहीं हुई, तो रोजी-रोटी के जुगाड़ में रायबरेली, सुलतानपुर, अमेठी आए मजदूर साइकिल पर सवार होकर ही अपने घर के लिए निकल पड़े हैं। कोई माह, दो माह तो कोई 3-4 माह से ज्यादा काम नही कर पाया।</p>
<p>कोरोना महामारी के चलते हुए लॉकडाउन ने उन्हें घर वापसी को विवश कर दिया। जो दिहाड़ी इन मजदूरों ने कमाई वह सब लॉकडाउन दौरान खाने-पीने में खर्च हो गयी। अब जब यहां बिन पैसे के रहना मुश्किल हो गया तो सबने घर वापसी का निर्णय लिया। समस्या यह थी घर पहुंचे कैसे? सबने अपने-अपने घर से रुपये मंगाए और 10 नई व 14 पुरानी साइकिलें खरीदी। नई साइकिलें इन्हें चार हजार रुपये और पुरानी साइकिलें डेढ़ से दो हजार रुपये में मिली। रायबरेली के बछरावां में कार्यरत रहे दो दर्जन मजदूर बिहार और झारखंड के लिए भोर में निकल पड़े।</p>
<p>लखनऊ-बलिया राजमार्ग पर निकला ये कारवां अपने गंतव्य की ओर अग्रसर है। धनपुरिया, धमरी, चौरा, मारपा, गोड्डा, खेसर, पोहरण, बाका आदि जिलों के विनय, सुनील, शकंर, अशोक, युवराज, मनोज, नीतीश, निरंजन, मोहम्मद मतीउर, कलावती आदि मजदूरों की हताशा और निराशा चेहरे पर साफ दिखाई दी।</p>
<p><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/saikil.jpg"><img class="  wp-image-21371 alignright" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/saikil.jpg" alt="saikil" width="384" height="200" /></a>बिहार निवासी विनय मंडल ने बताया कि रायबरेली के बछरावां में डीके बिल्डर्स के यहां ये सभी काम करते हैं। लॉकडाउन से एक माह 10 दिन पहले वे अपने घरों से आये थे। इस दौरान जितना कमाया था, वह सब लॉकडाउन में दो जून की रोटी में खर्च हो गया। बकौल विनय, सरकारी सहायता के लिये अधिकारियों को हमने अपनी व्यथा बताई। थाने पर सूचना दी। पर, नतीजा सिफर निकला। मजबूरन हम लोगों ने यह कदम उठाया। साइकिल खरीद करके घर जाने की सब लोगों ने योजना बनाई।</p>
<p>बिहार की महिला कलावती अपने पति भोलाराय व तीन बच्चों संग काम करती है। घर जाने के लिए उन्हें दो साइकिल लेनी पड़ी। उन्होंने बताया कि वह अपने बच्चों राहुल, रेखा, मनोज व पति संग घर जा रहीं है। जो मजदूरी मिली थी वह सब खाने में खर्च हो गई। अब जब कुछ नहीं बचा तो घर वापसी के लिए कर्ज लेकर साइकिल खरीदी है। विजय राय ने बताया, लगभग डेढ़ माह पहले ही वे बिहार से आए थे। इस दौरान जो मजदूरी मिली सब समाप्त हो गई। घर से पैसा मंगाकर साइकिल खरीदी है।</p>
<p>झारखंड के रहने वाले सुनील यादव उनका दर्द भी औरों से जुदा नहीं है। सुनील ने बताया कि घर जाने के लिए उन्होंने भी नई साइकिल खरीदी है। मोबाइल के जरिए घरवालों से बातचीत बराबर हो रही है। अपनी लोकेशन बराबर दें रहें हैं। मोहम्मद मतीउर कटिहार जिले के रहने वाले हैं। फरवरी में वहां से आए थे। साइकिल खरीदने के लिए उन्होंने अपने साथियों से कर्ज लिया है। घर जाकर अदा करेंगे।</p>
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