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	<title>Business Link &#187; महाराष्ट्र</title>
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		<title>दो दशक में 97 फीसद पलायन का जिम्मेदार कौन?</title>
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		<pubDate>Thu, 21 May 2020 21:22:50 +0000</pubDate>
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		<description><![CDATA[जिम्मेदार हैं तो कांग्रेस, सपा और बसपा के ये घडिय़ाली आंसू क्यों योगी सरकार प्रवासी श्रमिकों के सुरक्षित, ससम्मान वापसी के साथ उनके रोजगार को लेकर भी फिक्रमंद कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों एवं कामगारों को लेकर राजनीति चरम पर है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में लॉकडाउन &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>जिम्मेदार हैं तो कांग्रेस, सपा और बसपा के ये घडिय़ाली आंसू क्यों</strong></li>
<li><strong>योगी सरकार प्रवासी श्रमिकों के सुरक्षित, ससम्मान वापसी के साथ उनके रोजगार को लेकर भी फिक्रमंद</strong></li>
</ul>
<figure id="attachment_21287" style="width: 108px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/girish-ji.jpeg"><img class="  wp-image-21287" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/girish-ji.jpeg" alt="girish ji" width="108" height="158" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>गिरीश पांडेय</strong></figcaption></figure>
<p>कोरोना के इस अभूतपूर्व संकट के दौरान प्रवासी श्रमिकों एवं कामगारों को लेकर राजनीति चरम पर है। एक ओर जहां मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की अगुआई में लॉकडाउन के पहले चरण से ही श्रमिकों के ससम्मान और सुरक्षित वापसी के लिए हर संभव प्रयास किये जा रहें हैं वहीं कुछ दिनों से अपनी असली-नकली बसों के जरिए कांग्रेस प्रदेश इस मुद्दे पर सरकार को घेरने की कोशिश कर रही है। सपा और बसपा कमोबेश यही काम ट्वीटर पर कर रहे हैं।</p>
<p>इस आरोप-प्रत्यारोप से दीगर पलायन से जुड़ी समस्या का एक और पहलू भी है। क्या वजह है कि उप्र के लोग इतनी बड़ी संख्या में घर-परिवार, नाते-रिश्तेदार को छोड़ अपनी जवानी खपाने दूसरे प्रदेशों के बड़े शहरों में जाते हैं? आजादी के इतने वर्षों के बाद भी देश की सबसे उर्वर भूमि (इंडो गंगेटिक बेल्ट) गंगा, यमुना और घाघरा जैसी बड़ी नदियों, वैविध्यपूर्ण जलवायु और प्रचुर मानव संसाधन होने के बावजूद स्थानीय स्तर पर रोजगार के अवसर क्यों नहीं उपलब्ध हैं? इसके लिए दोषी कौन है? कुछ आंकड़ों से यह तस्वीर साफ हो जाएगी।</p>
<p>उप्र से पिछले दो दशकों में 20 से 29 वर्ष की उम्र के लोगों का पलायन 97 फीसद बढ़ा है। यही किसी व्यक्ति की सर्वाधिक उत्पादक उम्र होती है। इसी उम्र में वह घर-परिवार, समाज, प्रदेश और देश को अपना सर्वश्रेष्ठ दे सकता है। त्रासदी यह कि इसी समयावधि में उप्र से पलायन की यह दर पड़ोसी राज्य बिहार की तुलना में दोगुनी है। आंकड़े खेतीबाड़ी से जुड़ी देश की सबसे बड़ी संस्था भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (आईसीएआर) के हैं।</p>
<p>आईसीएआर द्वारा प्रकाशित रिसर्च जनरल डबलिंग फार्मर इनकम स्ट्रेटजी ऑफ उत्तर प्रदेश में इसका जिक्र है। गौर करने लायक है कि पिछले दो दशकों के दौरान प्रदेश में किनकी सत्ता थी। साथ ही आजादी के बाद प्रदेश में सर्वाधिक समय तक कौन सत्ता में रहा। हर कोई जानता है कि सर्वाधिक समय तक प्रदेश की सत्ता में कांग्रेस रही है और पिछले दो दशकों में अधिकांश समय तक सपा और बसपा ही सत्ता पर काबिज रहीं। फिर भी अगर यहां से लोग रोजी-रोटी की तलाश में बाहर जाते रहे तो इसका दोषी कौन?</p>
<p>संबंधित दलों के प्रबुद्ध लोग जरूर इस आंकड़े से वाकिफ होंगे। अगर नहीं है तो ये उनके लिए शर्म की बात है। शर्त यह है कि अगर उनके पास शर्म बची हो। ऐसे में कोरोना के संकट के कारण महाराष्ट्र, पंजाब, दिल्ली और हरियाणा के बड़े शहरों में अपने सपनों को पूरा करने के लिए जो लोग गये हैं उनके संकट से भी जरूर वाकिफ होंगे। फिर पहले लॉकडाउन के समय से ही उनको इसका आभास क्यों नहीं हुआ? क्यों वे शुतुरमुर्ग की तरह इस संकट को बढऩे की प्रतीक्षा कर रहे थे? दिल्ली को छोड़ इनमें से सभी राज्यों में कांग्रेस सत्ता में साझीदार है। सवाल उठता है कि कांग्रेस ने तब तक का इंतजार क्यों किया जब प्रवासी सडक पर आ गये। जेठ की तपती धूप में वे भूख-प्यास से बेहाल होने लगे। सडकों पर कुचलकर वे मरने लगे। क्या कांग्रेस अपनी राजनीतिक रोटी सेंकने के लिए इसी समय की प्रतीक्षा कर रही थी।</p>
<p>लॉकडाउन के पहले ही चरण में राजधानी और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में लाखों की संख्या में श्रमिक सडक पर आ गये तो कांग्रेस सहित अन्य दल क्या कर रहे थे? कोटा और राजस्थान की समृद्धि में योगदान देने वाले हजारों बच्चों को उनके घर तक पहुंचाने के लिए कांग्रेस ने क्या किया? जब पानी सर के ऊपर से गुजर गया तो सोचा कि बहती गंगा में डुबकी लगा कर पुण्य कमा लिया जाये। आने वाले समय में जनता उससे ये सवाल जरूर पूछेगी।</p>
<p>जहां तक भाजपा खास कर उप्र के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की बात है तो वह पहले दिन से ही प्रवासी मजदूरों से होने वाली इस समस्या और इससे उत्पन्न समस्याओं एवं चुनौतियों के प्रति संजीदा थे। दिल्ली और राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र से अप्रैल के अंत में दिन-रात एक कर चार दिनों में चार लाख से अधिक श्रमिकों की वापसी, कोटा से 12 हजार बच्चों और प्रयागराज से 10 हजार बच्चों की वापसी इसका सबूत है। यही नहीं अब तक 1000 से अधिक ट्रेनों और बसों के जरिये करीब 22 लाख से अधिक लोगों की घर वापसी हो चुकी है। वह भी पूरी सुरक्षा और सम्मान से। हर आने वाले को उसकी दक्षता के अनुसार वह स्थानीय स्तर पर रोजी-रोटी की भी चिंता कर रहे हैं। बावजूद इसके इतनी घटिया राजनीति का कोई औचित्य नहीं।</p>
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		<title>कोरोना के कारण चख नहीं पाए आमों का स्वाद</title>
		<link>http://businesslinknews.com/the-taste-of-mangoes-did-not-taste-due-to-corona/</link>
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		<pubDate>Sat, 09 May 2020 13:58:10 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
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		<description><![CDATA[दक्षिण भारतीय आम की किस्में के साथ दशहरी भी देने लगी है दस्तक लखनऊ&#124; उत्तर भारतीय आमों का सीजन अभी शुरू नहीं हुआ, लेकिन दक्षिण भारतीय आम आकर अपना पैर जमाने लगे हैं&#124; ऐसा आमतौर पर हर साल होता है कि आंध्र प्रदेश का बंगनापल्ली जिसे सफेदा भी कहते हैं मार्केट में मार्च अप्रैल मे ही आने &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>दक्षिण भारतीय आम की किस्में के साथ दशहरी भी देने लगी है दस्तक</strong></li>
</ul>
<figure id="attachment_21327" style="width: 142px;" class="wp-caption alignleft"><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/shailendra-ranjan.jpg"><img class="  wp-image-21327" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2020/05/shailendra-ranjan.jpg" alt="shailendra ranjan" width="142" height="142" /></a><figcaption class="wp-caption-text"><strong>डॉ. शैलेंद्र राजन</strong></figcaption></figure>
<p><strong>लखनऊ| </strong>उत्तर भारतीय आमों का सीजन अभी शुरू नहीं हुआ, लेकिन दक्षिण भारतीय आम आकर अपना पैर जमाने लगे हैं| ऐसा आमतौर पर हर साल होता है कि आंध्र प्रदेश का बंगनापल्ली जिसे सफेदा भी कहते हैं मार्केट में मार्च अप्रैल मे ही आने लगता है और मिल्क शेक और दूसरे व्यंजनों में लोग इसका इस्तेमाल करना शुरू कर देते हैं | अधिक लाभ कमाने के चक्कर में दक्षिण भारत के किसान इसे बहुत जल्दी तोड़ देते हैं और गुणवत्ता पर ध्यान नहीं देते हैं| फलस्वरूप, फलों को खाने के बजाय आम के स्वाद का स्वाद लेने के लिए लोग इसे मिल्कशेक और दूसरे व्यंजनों में मिलाकर प्रयोग में लाते हैं, धीरे-धीरे समय के साथ सफेदा आम भी गुणवत्ता वाला हो जाता है| देखने में तो आकर्षक है और फलों के टिकाऊ होने के कारण काफी दिनों तक रखा जा सकता है|</p>
<p style="font-weight: 400">इस वर्ष कोरोना के कारण उत्तर भारतीय बाजारों में आम की मांग कम तो थी ही, साथ ही साथ दक्षिण भारत के बागों में आम की पैदावार भी कम थी| आंध्र प्रदेश में तो कई स्थानो पर कुल उत्पादन का केवल 25% ही आम था| इन दोनों कारणों से उत्तर भारतीयों को दक्षिण भारतीय आमों को ठीक से चखने का मौका नहीं मिला| कोरोना वायरस के डर के मारे आम खाने की किसको फुर्सत थी| अब थोड़ा लोग संभले हैं तो आम भी अपने पैर बाज़ार मे जमाने लगा है| कुछ ही दिनों में आम के ठेले गलियों में दिखने लगेंगे|</p>
<p style="font-weight: 400">बंगनापल्ली के अतिरिक्त, मार्केट में बहुत ही आकर्षक लाल रंग के कारण स्वर्णरेखा आम की भी काफी मांग रहती है| देखने में यह आम खूबसूरत है परंतु स्वाद रंग रूप के अनुरूप नहीं होता है| यह आम लखनऊ और दिल्ली के मार्केट में काफी मात्रा में आ चुका है| आंध्र प्रदेश तथा उड़ीसा के दक्षिणी भारत भागों से स्वर्णरेखा और बंगापल्ली दोनों की ही आवक उत्तर भारत के मार्केट में हर साल लगभग तय है| उत्तर भारतीयों को दशहरी के मुकाबले दूर से दर्जे का स्वाद रखने वाले इन आमों को खाकर ही काम चलाना पड़ता है|</p>
<p style="font-weight: 400">दशहरी, जिसका उत्तर भारत में ही दबदबा नहीं वरन इसे कई दक्षिण भारतीय किसानों ने भी उगाना शुरू कर दिया है| आंध्र प्रदेश में दशहरी की खेती के प्रति किसानों का रुझान बढ़ा है| संस्थान से हजारों पौधे किसानों को वहां पर उपलब्ध कराएं हें | हालांकि, दशहरी का असली रंग रूप वहां देखने को नहीं मिलता है लेकिन फिर भी दशहरी का स्वाद तो दशहरी का ही है| आंध्र प्रदेश, कर्नाटक, महाराष्ट्र, गुजरात और अन्य स्थानों पर दशहरी उगाने का मुख्य कारण इस किस्म की कई खासियत है| यद्यपि यहां पर दशहरी का आकार लखनऊ के मुकाबले बहुत छोटा होता है परंतु स्वाद में काफी समानता एवं लोगों में बढ़ती इसकी लोकप्रियता के कारण किसानो ने नए बागों में लगाना प्रारंभ कर दिया है| दशहरी  की उपज इन प्रदेशों में काफी अच्छी है जिसके कारण किसान उससे संतुष्ट है|</p>
<p style="font-weight: 400">आंध्र प्रदेश में उत्पादित दशहरी पकने लगी है और उसका दिल्ली मार्केट लखनऊ के फलों से पहले आ जाना स्वाभाविक है| आंध्र प्रदेश, महाराष्ट्र, उड़ीसा एवं गुजरात के बहुत से क्षेत्रों में दशहरी का उत्पादन होना शुरू हो गया है और यह सभी स्थान मार्केट में मई के पहले पखवाड़े में ही दशहरी उपलब्ध कराने की सामर्थ रखते हैं| आमतौर पर मलिहाबाद के किसान इस बात से आशंकित रहते हैं कि दशहरी उनके बाजार पर कब्जा ना जमाले| दक्षिण भारत का दशहरी उनके लिए एक अच्छा प्लेटफार्म तैयार करने की कोशिश कर रहा है| उत्तर प्रदेश के अतिरिक्त कई प्रेदेशों में दशहरी के पैदा होने पर लोग उसके स्वाद से परिचित हो चुके हैं| इसका लाभ उत्तर भारत के असली दशहरी उत्पादकों को मिल सकता है, क्योंकि जब बेहतरीन दशहरी उत्तर भारत से वहां पहुंचेगा तो उसको वहाँ के बाज़ार में पैर जमाने में कोई कठिनाई नहीं होगी|</p>
<p style="font-weight: 400">अभी तक देखा गया है कि दक्षिण भारतीय किसमें ही उत्तर भारत में ज्यादा लाभ कम आती हैं| सीजन के शुरुआत में मार्केट में आए आम को महंगे दाम पर भी खरीदने में किसी को कोई परेशानी नहीं होती है| ऐसा इसलिए है क्योंकि लगभग 1 साल बाद आम चखने का मौका कोई नहीं छोड़ना चाहता| जैसे ही उत्तर भारत के बागों में आम तैयार हो जाता है दक्षिण भारतीय क़िस्मों का फल आना बंद हो जाता हैं और कई बार ऐसा उनकी फसल खत्म हो जाने के कारण भी होता है|</p>
<p style="text-align: right"><strong><em>लेखक, केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा लखनऊ के निदेशक हैं।</em></strong></p>
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