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	<title>Business Link &#187; राज्य स्वास्थ्य संस्थान</title>
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		<title>बाबूगीरी नहीं, अब इलाज करेंगे चिकित्सक!</title>
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		<pubDate>Mon, 10 Dec 2018 10:58:40 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[मेडिकल]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीती प्रशासन]]></category>
		<category><![CDATA[प्रमुख सचिव चिकित्सा]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य स्वास्थ्य संस्थान]]></category>
		<category><![CDATA[विशेषज्ञ चिकित्सक]]></category>

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		<description><![CDATA[चिकित्सा विभाग के विभिन्न कार्यालयों में सैकड़ों विशेषज्ञ चिकित्सक वर्षों से अपने मूल कर्तव्य से हैं दूर अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों को तैनात करने के लिए प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य ने जारी किया आदेश प्रदेश के चिकित्सालयों में है विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी बीते दिनों 200 चिकित्सक हुए थे अनुबंधित, जिनके मानदेय पर प्रतिवर्ष खर्च &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>चिकित्सा विभाग के विभिन्न कार्यालयों में सैकड़ों विशेषज्ञ चिकित्सक वर्षों से अपने मूल कर्तव्य से हैं दूर </strong></li>
<li><strong>अस्पतालों में विशेषज्ञ चिकित्सकों को तैनात करने के लिए प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य ने जारी किया आदेश </strong></li>
<li><strong>प्रदेश के चिकित्सालयों में है विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी </strong></li>
<li><strong>बीते दिनों 200 चिकित्सक हुए थे अनुबंधित, जिनके मानदेय पर प्रतिवर्ष खर्च होंगे लगभग 10 करोड़ रुपये</strong></li>
</ul>
<p><strong>बिजनेस लिंक ब्यूरो </strong></p>
<p><strong><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/12/dr01.jpg"><img class="  wp-image-11647 alignleft" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/12/dr01-188x300.jpg" alt="dr01" width="221" height="353" /></a>लखनऊ। </strong>प्रदेश में बड़ी तादाद में अपने मूल दायित्व से दूर सरकारी विशेषज्ञ चिकित्सकों को अब स्वास्थ्य महकमा बाबूगीरी के काम से हटाकर रोगियों के इलाज में तैनात करेगा। पर, यह प्रक्रिया महज मुख्य चिकित्साधिकारी के अधीन तैनात विशेषज्ञ चिकित्सकों के प्रकरणों में ही अपनायी जायेगी। एक ओर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों में चिकित्सकों की भारी कमी है, जो जनसामान्य को बेहतर इलाज दिलाने में बाधक है। वहीं दूसरी ओर प्रदेश में सैकड़ों सरकारी चिकित्सक वर्षों से मुंशीगीरी के कार्य में लगे हुए हैं।</p>
<p>बीते दिनों विशेषज्ञ चिकित्सकों को चिकित्सालयों में तैनात करने के लिए प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य प्रशान्त त्रिवेदी ने प्रदेश के समस्त जिलाधिकारियों को पत्र भेजा है, जिसमें लिखा है कि प्राय: ऐसा देखने में आया है कि विशेषज्ञ विधा के चिकित्सकों की मुख्य चिकित्साधिकारी के अधीन तैनाती होने के कारण उनकी विशेषज्ञ विधा की व्यापक रूप से उपयोगिता नहीं हो पा रही है। जनसामान्य को बेहतर चिकित्सा सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए चिकित्सालयों में विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी दूर करने के लिए मुख्य चिकित्साधिकारी के अधीन तैनात विशेषज्ञ चिकित्सकों को जनपद के जिलाधिकारी के अनुमोदन से तत्कालिक रूप से संबंद्ध किया जाना है। प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य के इस पत्र में लिखा है कि जनपद के मुख्य चिकित्साधिकारी के अधीन तैनात विशेषज्ञ विधा के ऐसे चिकित्सक जिनकी चिकित्सालयों में आवश्यकता है, उन्हें चिन्हित करते हुए चिकित्सालयों में इनकी तैनाती के लिए जिलाधिकारी का अनुमोदन प्राप्त किया जाय। साथ ही इसकी सूचना शासन को उपलब्ध कराई जाय, जिससे विशेषज्ञ चिकित्सकों का संबंधित चिकित्सालयों में समायोजन किया जा सके।</p>
<p>गौरतलब है कि बीते दिनों चिकित्सा विभाग ने डॉक्टरों की कमी के नाम पर करोड़ों का मानदेय खर्च कर चिकित्सकों को अनुबंधित किया है। चिकित्सा विभाग के कई ऐसे संस्थान व कार्यालय हैं, जहां विशेषज्ञ चिकित्सक वर्षों से अपने मूल कर्तव्य से दूर हैं और मुंशीगीरी के कार्य में जोत दिये गये हैं। प्रदेश में ऐसे चिकित्सकों की संख्या सैकड़ों में है। सरकार-ए-सरजमीं लखनऊ के अलीगंज स्थित राज्य स्वास्थ्य संस्थान तो महज बानगी भर है। यहां विशेषज्ञ चिकित्सक वर्षों से आराम फरमा रहे हैं। बता दें कि प्रदेश के 75 जनपदों के पेयजल की जांच करने वाले राज्य स्वास्थ्य संस्थान में आधा दर्जन चिकित्सक तैनात हैं। इनमें से चार विशेषज्ञ चिकित्सक हैं। संस्थान में कार्यवाहक अपर निदेशक के पद पर कार्यरत सुषमा सिंह स्त्री एवं प्रसूत रोग विशेषज्ञ हैं, जो इस संस्थान में पानी के जांच दल की मुखिया हैं।</p>
<p>वहीं कार्यवाहक अपर निदेशक के पति डा. एपी सिह बाल रोग विशेषज्ञ हैं, जो संस्थान में संयुक्त निदेशक के पद पर तैनात हैं। संस्थान में नेत्र रोग विशेषज्ञ डॉ. सविता विश्वास भी तैनात हैं। इसके अलावा एक एमबीबीएस डा. संदीप गुलाटी भी हैं। इन चिकित्सकों के अलावा डॉ. मीना सिंह भी इस संस्थान की वेतनभोगी हैं। पर, इनकी तैनाती किसी अन्य संस्थान में है। एक शासनादेश के अनुपालन में इनका वेतन संस्थान वहन कर रहा है। वहीं लम्बे समय से अस्वस्थ हड्डी रोग विशेषज्ञ डॉ. अजय साहनी को लम्बे समय से प्रतिमाह पूरा वेतन गिफ्ट के रूप में दिया जा रहा है। डॉ. साहनी की अस्वस्थ्ता का आलम यह है कि वो अकेले कहीं आने-जाने में असमर्थ हैं। इसलिये उनके परिजन रोजाना उन्हें कार्यालय लेकर आते हैं और उपस्थिति रजिस्ट्रर में हस्ताक्षर करवाने के बाद साथ लेकर ही चले जाते रहे हैं।</p>
<p>यह सिलसिला लम्ब समय से चल रहा है। बीते दिनों जरूर उन्हें दोपहर तक कार्यालय में बिठाया गया, पर यह अधिक दिनों तक हो नहीं सका। राज्य स्वास्थ्य संस्थान में काम के नाम पर विशेषज्ञ चिकित्सकों के करने लायक कुछ नहीं है। पानी की जांच अन्य स्टाफ ही निपटा देता है। बावजूद इसके उन्हें वेतन उतना ही मिलता है, जितना अस्पतालों में तैनात चिकित्सकों को। ऐसे में सवाल उठना लाजिमी है कि जनसामान्य को बेहतर चिकित्सा सुविधा उपलब्ध कराने वाली राज्य सरकार की सर्वोच्च प्राथमिकता तब तक पूरी नहीं होगी, जब तक सभी विशेषज्ञ चिकित्सकों को बाबूगीरी के कार्य से हटाकर मूल दायित्व नहीं सौंपा जाता।</p>
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		<title>औचक निरीक्षण के बाद ताले में उपस्थिति रजिस्टर</title>
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		<pubDate>Mon, 08 Oct 2018 13:58:08 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Breaking News]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[मेडिकल]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीती प्रशासन]]></category>
		<category><![CDATA[अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य स्वास्थ्य संस्थान]]></category>

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		<description><![CDATA[निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. मधु सक्सेना के औचक निरीक्षण में अपर निदेशक मिली गैरहाजिर इस दौरान चार संयुक्त निदेशक भी पाये गये अनुपस्थित निदेशक ने पहले किया गैरहाजिर, फिर चेतावनी देकर हस्ताक्षर करने की दी इजाजत मातहतों ने पहले से नहीं दी औचक निरीक्षण की सूचना तो आग-बबूला हुई अपर निदेशक शैलेन्द्र यादव लखनऊ। सरकारी &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. मधु सक्सेना के औचक निरीक्षण में अपर निदेशक मिली गैरहाजिर</strong></li>
<li><strong>इस दौरान चार संयुक्त निदेशक भी पाये गये अनुपस्थित </strong></li>
<li><strong>निदेशक ने पहले किया गैरहाजिर, फिर चेतावनी देकर हस्ताक्षर करने की दी इजाजत</strong></li>
<li><strong>मातहतों ने पहले से नहीं दी औचक निरीक्षण की सूचना तो आग-बबूला हुई अपर निदेशक</strong></li>
</ul>
<p><strong><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/10/123.jpg"><img class="  wp-image-8307 alignleft" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/10/123-300x118.jpg" alt="123" width="491" height="193" /></a>शैलेन्द्र यादव</strong></p>
<p><strong>लखनऊ।</strong> सरकारी व्यवस्था में जुगाड़ तंत्र की जड़ें कितनी गहरी हैं इसकी बानगी स्वास्थ्य विभाग के राज्य स्वास्थ्य संस्थान में बखूबी देखी जा सकती हैं। तमाम अनियमितताओं के लिये पहचाने जाने वाले इस संस्थान में 25 सितम्बर को निदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य ने औचक निरीक्षण किया। इस दौरान संस्थान की अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह के अलावा चार-चार संयुक्त निदेशक गैरहाजिर मिले। पहले इन सभी को उपस्थिति रजिस्टर में गैरहाजिर किया गया। लेकिन फिर रजिस्टर में उपस्थिति हस्ताक्षर करने की इजाजत दे दी गई।</p>
<p>राज्य स्वास्थ्य संस्थान में व्याप्त तमाम अनियमितताओं की शिकायत जब निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. मधु सक्सेना को हुई, तो 25 सितम्बर को वह संस्थान का औचक निरीक्षण करने पहुंची। इस दौरान संस्थान की अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह, संयुक्त निदेशक डॉ. अजय साहनी, डॉ. लालमणि, डॉ. निरुपमा सिंह और संस्थान की अपर निदेशक के पति डॉ. एपी सिंह गैरहाजिर मिले। निदेशक चिकित्सा स्वास्थ्य डॉ. सक्सेना ने पहले उपस्थिति रजिस्टर में इन सभी को अनुपस्थित किया। जब दोपहर 12 बजे के लगभग यह सभी कार्यालय पहुंचे, तो चेतावनी देते हुये इन सभी को उपस्थिति रजिस्टर में हस्ताक्षर करने की अनुमति दे दी गई। इस उपस्थिति रजिस्टर में 25 सितम्बर को अनुपस्थिति किये गये सभी संयुक्त निदेशकों और रजिस्टर के सबसे निचले पायदान पर अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह के हस्ताक्षर मौजूद हैं। संस्थान के सूत्रों की मानें तो अपर निदेशक मातहतों पर आग बबूला भी हुई कि औचक निरीक्षण की पहले से जानकारी होने के बावजूद उन्हें समय रहते क्यों नहीं बताया गया।</p>
<p>सूत्रों की मानें तो इस औचक निरीक्षण के बाद अब राज्य स्वास्थ्य संस्थान में एक नई व्यवस्था ने जन्म लिया है। इस व्यवस्था के तहत भविष्य में होने वाले किसी औचक निरीक्षण के दौरान उपस्थिति रजिस्टर में अपनी और अपनों की गैरहाजिरी लगने से बचाने के लिये संस्थान की अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह एहतियातन अनुपस्थिति रजिस्टर अब ताले में बंद करके जाती हैं। ताकि यदि अब कभी औचक निरीक्षण हो, तो कम से कम रजिस्टर में चहेतों की अनुपस्थिति न लग सके। इस नई व्यवस्था के तहत अपर निदेशक जब कार्यालय पहुंचती है, तो उसके बाद ही यह उपस्थिति रजिस्टर ताले से बाहर निकालता है और तब सभी संयुक्त निदेशक इस रजिस्टर में उपस्थिति वाले हस्ताक्षर बनाते हैं।</p>
<p>गौरतलब है कि प्रदेश के होटल, शराब फैक्ट्री, गेस्ट हाउस, प्रतिष्ठान, चिकित्सा विश्वविद्यालय, विश्वविद्यालय, कालेज, स्कूल, आइसक्रीम फैक्ट्री आदि में जल परीक्षण के नाम पर उत्तर प्रदेश राज्य स्वास्थ्य संस्थान में उगाही का सिलसिला खुलेआम चल रहा है। ऐसा नहीं है कि इस काले कारनामें के खिलाफ किसी ने आवाज नहीं उठाई, शासन-प्रशासन के सर्वोच्च स्तर पर इसकी शिकायतें हुई, पर हुआ कुछ नहीं। पेयजल में आर्सेनिक या विषैले तत्वों की मात्रा कैंसर जैसे घातक रोगों का कारक है। यह एक चिकित्सक से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता। पर, जब राज्य स्वास्थ्य संस्थान में तैनात चिकित्सकों को ही पेयजल के परीक्षण की दलाली राश आने लगे, तो यह स्थिति अत्यधिक चिंतनीय है।</p>
<p><strong>अब हुई जल परीक्षण शुल्क की सूची चस्पा करने की रस्म अदायगी</strong><br />
बीते अंक में बिजनेस लिंक ने राज्य स्वास्थ्य संस्थान में जल परीक्षण के एवज में की जा रही धांधली की खबर प्रमुखता से प्रकाशित की थी। राज्य स्वास्थ्य संस्थान प्रबंध तंत्र ने अब जल परीक्षण शुल्क की सूची संस्थान की दीवारों पर चस्पा करने की रस्म अदायगी की है। गौरतलब है कि राज्य स्वास्थ्य संस्थान प्रबंध तंत्र की मनमानी का आलम यह है कि इसे पानी की दलाली पीने से भी परहेज नहीं है। पहले पानी की जांच फेल करना और फिर मनचाही वसूली कर पानी के उसी नमूने की रिपोर्ट पर संतोषप्रद की मुहर लगाना यहां की कार्यशैली में रच-बस चुका है। सरकार-ए-सरजर्मी लखनऊ में खुलेआम पानी की दलाली का यह धंधा स्वास्थ्य संस्थान में सुनियोजित रूट संचालित हो रहा है। शासन-प्रशासन के सर्वोच्च स्तर पर शिकायतों के बावजूद इस प्रकरण पर किसी का ध्यान न जाना बहुत कुछ बयां करता है।</p>
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		<item>
		<title>गंदा है पर धंधा है</title>
		<link>http://businesslinknews.com/is-dirty-but-business/</link>
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		<pubDate>Wed, 03 Oct 2018 10:07:55 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Breaking News]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[मेडिकल]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीती प्रशासन]]></category>
		<category><![CDATA[राज्य स्वास्थ्य संस्थान]]></category>
		<category><![CDATA[स्वास्थ्य विभाग]]></category>

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		<description><![CDATA[पानी की दलाली पी रहा राज्य स्वास्थ्य संस्थान स्वास्थ्य संस्थान का ‘टॉप टू बॉटम’ इस धंधे का सिपाही स्वास्थ्य संस्थान में पानी की दलाली के धंधे से संबंधित पुख्ता साक्ष्य बिजनेस लिंक के पास हैं मौजूद अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह ने अपना पक्ष देने से किया किनारा, समय देकर नहीं की मुलाकात, न उठाया &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>पानी की दलाली पी रहा राज्य स्वास्थ्य संस्थान</strong><br />
<strong>स्वास्थ्य संस्थान का ‘टॉप टू बॉटम’ इस धंधे का सिपाही</strong><br />
<strong>स्वास्थ्य संस्थान में पानी की दलाली के धंधे से संबंधित पुख्ता साक्ष्य बिजनेस लिंक के पास हैं मौजूद </strong><br />
<strong>अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह ने अपना पक्ष देने से किया किनारा, समय देकर नहीं की मुलाकात, न उठाया सीयूजी</strong></li>
</ul>
<p><strong>शैलेन्द्र यादव</strong></p>
<p><strong>लखनऊ।</strong> सरकार और स्वास्थ्य महकमा सभी को बेहतर स्वास्थ्य सुविधायें मुहैया कराने में व्यस्त है। पर, राज्य स्वास्थ्य संस्थान, उत्तर प्रदेश प्रबंध तंत्र पानी की दलाली पीने में मस्त है। पहले जांच असंतोषप्रद घोषित करना, फिर मनचाही वसूली से उसी रिपोर्ट पर संतोषप्रद की मुहर लगा देना राज्य स्वास्थ्य संस्थान की कार्यशैली में रच-बस चुका है। सरकार-ए-सरजर्मी लखनऊ के अलीगंज क्षेत्र स्थित स्वास्थ्य विभाग के इस संस्थान में जल परीक्षण जांंच की नोडल अधिकारी स्वयं संस्थान की अपर निदेशक डॉ. सुषमा सिंह हैं। दलाली के इस सुनियोजित धंधे का उत्पत्ति वर्ष 2011 बताया जा रहा है। तब से संचालित हो रहे इस कारनामें के खिलाफ विभागीय कर्मचारियों ने शासन-प्रशासन के सर्वोच्च स्तर पर विराजमान शासकीय शक्तियों को पत्र लिखे। बावजूद इसके इस ओर जिम्मेदारों का ध्यान न जाना पीड़ादायक है।</p>
<p>जानकारों की मानें तो इन वर्षों में अपर निदेशक की कुर्सी पर आसीन होने वाले लगभग सभी चिकित्सकों ने पेयजल की खराब गुणवत्ता से होने वाले दुष्परिणामों की चिंता न करके इस गोरखधंधे से अपनी जेबे भरने में अधिक दिलचस्पी ली है। बीते दिनों सीतापुर जनपद के मदारीपुर सिधौंली स्थित ब्राइट फ्यूचर पब्लिक स्कूल के जल का नमूना पहले 23 अप्रैल 2018 को परीक्षण में प्रदूषित असंतोषप्रद बताया गया। जब संस्थान प्रबंध तंत्र दलाली का चढ़ावा प्राप्त करने में सफल हुआ, तो इस रिपोर्ट पर 15 मई 2018 को संतोषप्रद की मुहर लगा दी गई। इतना ही नहीं जनपद लखीमपुर खीरी स्थित एक आइसक्रीम फैक्ट्री के जल परीक्षण के नमूने पर कैसे संस्थान प्रबंध तंत्र द्वारा संतोषप्रद की मुहर लगाई गई, दलाली की यह दास्तान पीडि़त ने स्वयं बिजनेस लिंक को बयां की।</p>
<p>गौरतलब है कि प्रदेश के समस्त जनपदों के स्कूल, कॉलेज, विश्वविद्यालय, चिकित्सा विश्वविद्यालय, रेस्टोरेंट, प्रतिष्ठान, होटल, गेस्ट हाउस, आइसक्रीम फैक्ट्री और शराब फैक्ट्री आदि के जल परीक्षण का कार्य राज्य स्वास्थ्य संस्थान की जिम्मेदारी है। पर, यहां प्रदूषित असंतोषप्रद जल को संतोषप्रद में बदलने का खेल किसकी छत्रछाया में खेला जा रहा है, यह जांच का विषय है। फिलहाल, धन उगाही का यह धंधा खुलेआम चल रहा है। ऐसा भी नहीं है कि इसकी शिकायत नहीं हुई, शासन-प्रशासन के सर्वोच्च स्तर पर विभागीय लोगों ने इसकी शिकायतें कीं, पर हुआ कुछ नहीं। पेयजल में आर्सेनिक या विषैले तत्वों की मात्रा कैंसर जैसे घातक रोग का कारक बन सकती है। यह एक चिकित्सक से बेहतर कोई और नहीं समझ सकता। पर, जब विशेषज्ञ चिकित्सकों को ही जल परीक्षण की दलाली राश आने लगे, तो यह स्थिति आमजन के लिये चिंतनीय, सरकार और स्वास्थ्य महकमें के लिये शर्मनाक है।</p>
<blockquote><p><a href="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/10/dr.-padmakar.jpg"><img class="  wp-image-8243 alignleft" src="http://businesslinknews.com/wp-content/uploads/2018/10/dr.-padmakar-253x300.jpg" alt="dr. padmakar" width="67" height="79" /></a>आपने प्रकरण संज्ञान में लाया है। इसकी जांच करायी जायेगी। जो भी दोषी होंगे उन पर सख्त कार्रवाई की जायेगी।<br />
<strong>डॉ. पद्माकर सिंह, महानिदेशक, चिकित्सा स्वास्थ्य, उत्तर प्रदेश</strong></p></blockquote>
<p><strong>यहां नहीं लागू हो रहे चिकित्सा मंत्री के निर्देश</strong><br />
गौरतलब है कि विशेषज्ञ चिकित्सकों की कमी से प्रदेश की चिकित्सा सेवायें प्रभावित हैं। इस संबंध में उच्च न्यायालय टिप्पणी कर चुका है। सरकार ने प्रशासनिक पदों पर तैनात चिकित्सकों को चिकित्सकीय कार्य में लगाने का ऐलान किया। चिकित्सा स्वास्थ्य मंत्री सिद्धार्थ नाथ सिंह इस प्रकरण पर बेहद संजीदा हैं। बावजूद इसके राज्य स्वास्थ्य संस्थान में उच्च न्यायालय, सरकार और चिकित्सा मंत्री की यह मंशा परवान नहीं चढ़ पा रही है। यहां लगभग एक दर्जन विशेष योग्यता वाले आर्थोपेडिक्स, सर्जन, बालरोग विशेषज्ञ, गायनोकोलाजिस्ट, आई सर्जन आदि तैनात हैं जिनसे एक नया अस्पताल सुचारू रूप से संचालित हो सकता है। पर, यह चिकित्सकीय धर्म से दूर हैं।</p>
<p><strong>जिसने की इस गंदे धंधे की शिकायत, वह हुआ प्रताडि़त</strong><br />
राज्य स्वास्थ्य संस्थान में जल परीक्षण में की जा रही धांधली की शिकायत करने वाले कर्मचारियों को प्रबंध तंत्र समय-समय पर प्रताडि़त करता रहा है। जानकारों की मानें तो बीते वर्षों में एक वरिष्ठ लैब टैक्नीशियन ने इस गंदे धंधे की शिकायत की थी। वर्ष 2011 में जब वह सेवानिवृत्त हुआ, तो तत्कालीन अपर निदेशक ने रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले उसके सभी लाभों पर रोक लगा दी। इतना ही नहीं पेंशन प्रपत्रों को पेंशन निदेशालय भेजने में भी लम्बे समय तक आनाकानी की गई। पीडि़त ने तत्कालीन प्रमुख सचिव चिकित्सा स्वास्थ्य से न्याय की गुहार भी लगाई थी।</p>
<p><strong>आरामतलबी की ऐशगाह बना संस्थान</strong><br />
राज्य स्वास्थ्य संस्थान विशेषज्ञ चिकित्सकों की आरामतलबी की ऐशगाह बन चुका है। मर्जी हुई तो कार्यालय पहुंचे, नहीं हुई तो नहीं आये। यदि आये भी, तो कार्य क्या किया यह जांच का विषय है।</p>
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