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	<title>Business Link &#187; सहायक प्रबंधक</title>
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	<description>Breaking News</description>
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		<title>परिणाम पहले, परीक्षा बाद में</title>
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		<pubDate>Mon, 17 Jun 2019 11:13:45 +0000</pubDate>
		<dc:creator><![CDATA[Editor]]></dc:creator>
				<category><![CDATA[Breaking News]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश]]></category>
		<category><![CDATA[एक्सक्लूसिव]]></category>
		<category><![CDATA[राजनीती प्रशासन]]></category>
		<category><![CDATA[उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवा मंडल]]></category>
		<category><![CDATA[को-ऑपरेटिव बैंक]]></category>
		<category><![CDATA[सहायक प्रबंधक]]></category>

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		<description><![CDATA[उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवा मंडल से हुई भर्तियों की पहचान बर्खास्त हुये उप्र को-ऑपरेटिव बैंक के 50 सहायक प्रबंधक, खेल करने वाले अब तक आजाद सहकार भारती और कर्मचारी संयुक्त परिषद ने की एफआईआर और गिरफ्तारी की मांग शैलेन्द्र यादव लखनऊ। प्रदेश के दर्जनों सहकारी संस्थाओं में भर्ती करने वाले उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत &#8230;]]></description>
				<content:encoded><![CDATA[<ul>
<li><strong>उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवा मंडल से हुई भर्तियों की पहचान</strong></li>
<li><strong>बर्खास्त हुये उप्र को-ऑपरेटिव बैंक के 50 सहायक प्रबंधक, खेल करने वाले अब तक आजाद</strong></li>
<li><strong><span style="line-height: 1.5">सहकार भारती और कर्मचारी संयुक्त परिषद ने की एफआईआर और गिरफ्तारी की मांग</span></strong></li>
</ul>
<p><strong>शैलेन्द्र यादव</strong></p>
<p><strong>लखनऊ।</strong> प्रदेश के दर्जनों सहकारी संस्थाओं में भर्ती करने वाले उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवा मंडल प्रबंध तंत्र की कार्यशैली पर बीते दो दशकों में कई बार गंभीर सवाल उठे हैं। भर्तियों में भ्रष्टाचार और नाते-रिश्तेदारों की मनमानी भर्तियों जैसे गंभीर आरोपों में सेवा मंडल के कई तत्कालीन चेयरमैन का दामन दागदार हुआ है। सहकारी सेवा मंडल की भर्तियों के सम्बंध में आमधारणा यह है कि आईएएस का सफल अभ्यर्थी भी इसकी परीक्षा पास नहीं कर सकता है। कारण, यहां परिणाम पहले घोषित होते रहे और परीक्षा बाद में आयोजित हुई।</p>
<p>बीते दिनों को-ऑपरेटिव बैंकों में अवैध तरीके से भर्ती किये गये 50 सहायक प्रबंधकों को राज्य सरकार ने बर्खास्त किया है। पर, इस अवैध भर्ती को अंजाम तक पहुंचाने वाले सेवा मंडल के धंधेबाज अधिकारी अब तक आजाद हैं और इन पर होने वाले ऐक्शन की तस्वीर भी साफ नहीं है। वैसे को-ऑपरेटिव बैंक के इन बर्खाश्त अपर प्रबंधकों को दोहरी मार झेलनी पड़ी है। पहली, इनकी नौकरी गई। दूसरी, इस नौकरी को हासिल करने के लिये सेवा मंडल के कमाऊ अधिकारियों पर लाखों का जो चढ़ावा चढ़ाया, वो झटका अलग लगा। जानकारों की मानें तो सहकारी संस्थागत सेवा मंडल में मनमानी भर्तियों की जड़े गहरी हैं। सेवा मंडल पिछले 20 सालों से मनमानी भर्तियों के लिये खाशा चर्चित  रहा है। आयुक्त एवं निबंधक कार्यालय सहित मंत्रालय की नौकरशाही तक भर्ती कोटा निर्धारित रहता था, जिस कारण सेवा मंडल की विश्वसनीयता तार-तार हुई।</p>
<blockquote><p>दोषी अधिकारियों पर एफआईआर को लेकर मामले का अध्ययन किया जा रहा है। जो भी भर्तियों के दोषी हैं, उन पर निश्चित तौर पर सख्त कार्यवाही होगी।<br />
<strong>एमवीएस रामी रेड्डी, प्रमुख सचिव, सहकारिता</strong></p></blockquote>
<p>&nbsp;</p>
<p>सूत्रों की माने तो सेवा मंडल में राधेश्याम सिंह एवं सीताराम वर्मा के कार्यकाल में अपने नाते रिस्तेदारों पिछड़े एवं सामान्य वर्ग में कुर्मी समाज के चयन की अधिकता रही। तो वही बाबू सिंह कुशवाहा के सहकारिता मंत्री रहते कुशवाहा बिरादरी को चयन सूची में वरीयता मिली। सीएम सिंह, लालमुनि चौबे, एसआरएस यादव, जेएल केसरवानी, शारदा प्रसाद जैसे अपर निबंधकों के पुत्र-पुत्रियों एवं निकट संबङ्क्षधयों का सहकारी बैंकों में प्रबंधक एवं वरिष्ठ प्रबंधक के पदों पर चयन इनके कार्यकाल में चॢचत रहा। इतना ही नहीं सेवानिवृत होने के बाद सेवा विस्तार पर ओमकार यादव जब भंडारागार एवं सेवा मंडल में रहे, उस समय की एक जांच कर रहे एसआईबी को-ऑपरेटिव सेल में तैनात रहे एक अपर पुलिस अधीक्षक के पुत्र अभय गंगवार का चयन फर्जी डिग्री छापकर कर लिया गया।</p>
<p>मामला उछलने पर हालही में गंगवार भंडारण निगम से बर्खास्त हुये हैं। जानकारों की मानें तो तत्कालीन सपा सरकार में उपभोक्ता सहकारी संघ के एमडी रहे एक अपर निबंधक ने तो सेवामंडल से नियुक्तियां कराने की जहमत ही नहीं समझी। बिना चयन प्रक्रिया अपनाये खुद ही नियुक्तियां करने का किॢतमान बनाया। तो वहीं उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव बैंक एवं सहकारी ग्राम विकास बैंक में 2003 में चयनित कई अभ्यर्थियों का स्थाई पता दारूलसफा दर्ज था, जो बाद में बदला गया। सहकारी सेवा मंडल की नियुक्तियां नाते-रिस्तेदारों, पुत्र-पुत्रियों से प्रारम्भ होकर बाद में पैसे के आधार पर होने लगी।</p>
<blockquote><p>मुख्यमंत्री से तत्कालीन एमडी और सेवा मंडल के पदाधिकारियों के खिलाफ एफआईआर दर्ज कर उनकी गिरफ्तारी की मांग की गई है। सरकार में बैठे कुछ लोग दोषी अफसरों को संरक्षण दे रहे हैं।<br />
<strong>वीरेन्द्र पाण्डेय, उपाध्यक्ष, सहकार भारती</strong></p></blockquote>
<p>&nbsp;</p>
<p>सूत्रों की माने तो सेवा मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष रामजतन यादव के कार्यकाल में क्लर्क की भर्ती में 10 से 15 लाख एवं प्रबंधक ग्रेड की भर्ती में 20 से 25 लाख का खुला रेट चला। कई विभागीय कर्मचारी और अधिकारी दलाल की भुमिका मे चॢचत भी हुये, जिन्होंने अपने पुत्र-पुत्रियों का चयन कराने के साथ ही अन्य आवेदकों से कमाई कर अपना कल्याण किया। बता दें कि सेवा मंडल द्वारा उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव बैंक लिमिटेड, यूपीसीबी में हुई 50 सहायक प्रबंधकों की अवैध नियुक्तियां निरस्त हुये आधा माह बीतने को है। बावजूद इसके धंधेबाज अफसरों पर कार्रवाई की तस्वीर साफ नहीं है। यूपीसीबी की प्रबंध कमिटी के फैसले और सेवा समाप्ति के आदेशों में अफसरों द्वारा भर्ती में किए गए खेल का पूरा उल्लेख होने के बावजूद उन पर अब तक कोई कार्रवाई नहीं हुई है।</p>
<p>जानकारों की मानें तो आदेशों में साफ कहा गया है कि तत्कालीन एमडी रविकांत सिंह सहित सहकारी संस्थागत सेवा मंडल के पदाधिकारियों ने नियमों से खिलवाड़ किया है। साथ ही उच्च न्यायालय के आदेशों की धज्जियां भी उड़ाते हुये चहेतों को मनमाने तरीके से भर्ती की रेवडिय़ां बांटी हैं। स्वयं सेवक संघ के सहयोगी संगठन सहकार भारती और सहकारिता कर्मचारी संयुक्त परिषद ने दोषी अधिकारियों पर मुकदमा दर्ज करते हुये गिरफ्तारी की मांग की है।</p>
<p>मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने सहकारी संस्थाओं में हुई मननानी भर्तियों पर कड़ा रुख अपनाया है। विभागीय जांच के आधार पर उत्तर प्रदेश को-ऑपरेटिव बैंक के 50 सहायक प्रबंधकों की बर्खास्त किया गया है। इससे पूर्व को-ऑपरेटिव बैंकों में उत्तर प्रदेश सहकारी संस्थागत सेवा मंडल से भर्ती का अधिकारी छीन कर व्यावसायिक बैंकों के कर्मचारियों की भर्ती करने वाली संस्था आईबीपीएस से कराने का निर्णय भी हुआ। साथ ही एसआईटी जांच के आदेश भी दिये गयेे। इस जांच की आंच में सेवा मंडल के तत्कालीन कई कमाऊ कपूत झुलसने के मुहांने पर हैं। लेकिन, कब तक, यह अभी भी साफ नहीं है। फिलहाल, सहकारिता विभाग के दूसरे महकमों के कई कर्मचारियों की बेचैनी बढ़ गयी है और निगाहें एसआईटी जांच पर अटकी हुई है।</p>
<blockquote><p>दोषी अफसरों पर कार्यवाही के बिना नियुक्तियां रद्द करना एकतरफा और अधूरी कार्रवाई है। दोषी अफसरों के खिलाफ एफआईआर दर्ज करके उनकी गिरफ्तारी और संपत्ति की जांच होनी चाहिये। तभी सही मायने में भ्रष्टïाचार पर संजीदा प्रहार होगा।<br />
<strong>मोहम्मद आसिफ जमाल, महामंत्री, सहकारिता कर्मचारी संयुक्त परिषद</strong></p></blockquote>
<p>&nbsp;</p>
<p>गौरतलब है कि प्रदेश के सहकारिता आंदोलन को गति देने के लिए अंग्रेजो के बनाए गये सहकारी अधिनियम-1912 के स्थान पर उत्तर प्रदेश सहकारी समिति अधिनियम-1965 लागू किया गया था। सहकारी संस्थाओं के कर्मचारियों की भर्ती के लिए 1976 में सहकारी संस्थागत सेवा मंडल की स्थापना की गयी, जिसमें अपर निबंधक एवं उप निबंधक जैसे विभागीय अधिकारियों की तैनाती चेयरमैन, सचिव एवं सदस्य के रूप मे शासन स्तर से होती रही।</p>
<p>जानकारों की मानें तो सहकारी संस्थागत सेवा मंडल में डोरीलाल वर्मा जैसे ईमानदार अपर निबंधकों की तैनाती तक चयन का पैमाना योग्यता एवं गुणवत्ता होती थी, परन्तु समय के साथ चयन में कदाचार एवं भर्तियों का खेल परवान चढऩे लगा। वर्ष 2004 से 2012 तक यह चरम पर रहा। चर्चा यह भी रही कि सेवा मंडल की परिक्षाओं में चहेतों की सादी कापियां तक जमा कराई गई हैं। सहकारी संस्थानों के पंजीकरण उन पर निगरानी एवं नियंत्रण के लिये बनाए गये निबंधक एवं उनके तंत्र द्वारा किए गये भ्रष्टाचार का दीमक सहकारी संस्थाओं में गहरे तक है। देखना यह है कि भ्रष्टचारमुक्त प्रदेश की पताका फहराने का दावा करने वाली योगी सरकार इसका इलाज कैसे करती है।</p>
<p><strong>अंधेरे में क्यों रहे आयुक्त</strong><br />
बीती 30 मई को बर्खाश्त हुए सहायक प्रबंधकों की नियुक्ति में नियमों की अनदेखी की गई है। आदेश के मुताबिक, भर्ती के लिए शैक्षिक योग्यता कम करने का जो प्रस्ताव एमडी ने सहकारिता आयुक्त निबंधक को भेजा, उसमें चयन प्रक्रिया के प्रचलित होने की जानकारी नहीं दी गई। यह भी कहा गया कि हाई कोर्ट से स्थगन आदेश के संबंध में शासन को न्याय विभाग से विधिक राय लेकर कोई फैसला लेना था। बावजूद इसके बैंक ने अपने स्तर पर विधिक राय लेकर एक साथ इतनी बड़ी संख्या में नियुक्ति के आदेश जारी कर दिये। इसमें पूर्व प्रायोजित मंशा दिखती है। इस तरह प्रबंध कमिटी ने इन भर्तियों का सारा दोष बैंक के तत्कालीन एमडी के सिर पर डाला है।</p>
<p><strong>जमकर हुई रिश्तेदारों की भ</strong>र्ती<br />
अवैध भर्तियों की शिकायत में भी कहा गया था कि सहकारिता विभाग में भर्ती के लिए गठित उप्र सहकारी संस्थागत सेवा मंडल के पदाधिकारियों ने अपने रिश्तेदारों की भर्ती की। जांच में इन आरोपों की पुष्टि हुई। सेवा मंडल के तत्कालीन अध्यक्ष राम जतन यादव ने भतीजे लाल मणि यादव और रिश्तेदार धर्मेन्द्र, जबकि सेवामंडल के तत्कालीन सदस्य संतोष कुमार श्रीवास्तव ने अपनी बेटी सुदीप्ता श्रीवास्तव का चयन करवाया। अध्यक्ष के निजी सचिव आलोक कुमार सक्सेना की बेटी दिशा, भंडारण नियम के तत्कालीन एमडी कृपाशंकर यादव के बेटे परितोष कुमार और बहू रश्मि यादव को भी नियुक्ति दी गई।</p>
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