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ड्राइवर ही नहीं तो कैसे संचालित हो इंटरसेप्टर

परिवहन विभाग के 6 जोनों में दी गयी है एक-एक इंटरसेप्टर

ओवरस्पीडिंग, ड्रंकन ड्राइविंग करने वालों की जाती है जांच

लखनऊ मंडल में निजी चालक का इंतजाम कर इंटरसेप्टर से होती जांच

kbn-10-nesw-CHEKINGलखनऊ। सरकारी विभाग व्यवस्था सुधारने के दावे तो तमाम करते हैं, लेकिन जब बात संसाधनों की आती है तो विभागों के दावे धरे के धरे रह जाते हैं। परिवहन विभाग भी इससे अछूता नहीं है। विभाग में ओवरस्पीडिंग, नशे की हालत में वाहनों का संचालन करने वालों की जांच पड़ताल के लिए रखे गये इंटरसेप्टर को चलाने के लिए ड्राइवर ही नहीं है। जिस अधिकारी को अपने जनपद में इंटरसेप्टर से जांच करनी है वह पहले निजी चालक का इंतजाम करते हैं और फिर इंटरसेप्टर ले जाते हैं। ऐसी व्यवस्था में इंटरसेप्टर का कितना उपयोग किया जा रहा होगा, इसकी हकीकत खुद समझी जा सकती है। उल्लेखनीय है कि परिवहन विभाग के प्रदेश में कुल 6 जोन हैं। इन सभी जोनों में ओवरस्पीडिंग, ड्रंकन ड्राइविंग की जांच के लिए एक-एक इंटरसेप्टर दिये गये हैं। लखनऊ जोन में 3 मंडल हैं जहां पर बिना चालक के एक इंटरसेप्टर से काम चलाया जा रहा है। सूत्रों की मानें तो लखनऊ मंडल में ही इंटरसेप्टर के जरिए जांच की जाती है। वह भी तब जब अधिकारी खुद निजी चालक का इंतजाम कर इंटरसेप्टर ले जाते हैं। सूत्रों की मानें तो इंटरसेप्टर लोगों को यातायात नियमों के प्रति जागरुक करने के लिए है। लेकिन इसका उपयोग सुरक्षित वाहन चलाने के लिए लोगों को जागरुक करने की बजाय चालान जैसे दूसरे कामों में किया जा रहा है।

खर्च हो रहा एक लाख रुपये

चालक के अभाव में इंटरसेप्टर का उपयोग आरटीओ चेकिंग दल नियमित तरीके से नहीं कर पा रहा है। वहीं इंटरसेप्टर में निजी कंपनी के लगे उपकरणों का खर्च परिवहन विभाग को हर महीने देना पड़ रहा है। सूत्रों के मुताबिक इंटरसेप्टर में लगे उपकरण का हर महीने एक लाख रुपये किराया कंपनी को जाता है। विभाग चालक का इंतजाम नहीं कर रहा है और निजी कंपनी को किराये के रूप में एक लाख रुपये का भुगतान कर रहा है।

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