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टैक्स वैलेट योजना लाये सरकार

जिस प्रकार कोरोना ने आम आदमी और व्यापारियों के आय को बुरी तरह से प्रभावित किया है, उसी तरह से इस कोरोना ने केंद्र सरकार और राज्य सरकारों को बुरी तरह से प्रभावित किया है। हम इस परेशानी को ऐसे समझ सकते हैं कि जब हमारे परिवार में पांच लोग हैं तो हम एक तरफ अपनी खत्म या कम हो रही आय और दूसरी तरफ उनके स्वास्थ्य और भोजन की चिंता को लेकर चिंतित हैं तो सरकार के पास तो 130 करोड़ का परिवार है उनकी चिंता कितनी बड़ी होगी, और ऐसे समय में जब उन्होंने अपने लगभग सारे टैक्स संग्रह को आगे कई महीनों तक सरका दिया है, मतलब जब तक कोई स्वेच्छा से एडवांस टैक्स ना भरे तो सरकार को आय होने वाली नहीं है और जब सरकार को आय होगी नहीं तो वह इतना बड़ा स्वास्थ्य इन्फ्रा को कब तक खींच पाएगी। अत: यह जरूरी है कि सरकार में इस पर मंथन हो की सरकार अपने राजस्व की व्यवस्था कैसे करे। इस सम्बंध में सरकार को कुछ सुझाव है जिस पर अमल कर सरकार पाने लिए वित्त की व्यवस्था कर सकती है।
पहला सरकार को सबसे पहली अपने घोषित बजट का पुनर्गठन करना चाहिए। बजट 2020-21 देश में सामान्य परिस्थितियों के लिए पारित हुआ था और वित्त वर्ष शुरू होते ही देश असामान्य परिस्थितियों से घिर गया है अब तक एक तिहाई वर्ष बीत चुका है और आगे भी स्पष्ट नहीं है की असामान्य परिस्थिति का माह कितना लम्बा चलेगा। मोटा-मोटी अनुमान है कि दिसम्बर से हालात सामान्य होंगे और फिर पहले जैसी पटरी पर शायद 2021-22 से देश चले। ऐसे में बजट 2020-21 में घोषित सभी अनुमान, संग्रह लक्ष्य एवं योजनागत एवं गैर योजनागत खर्च सबकी राशि बदलनी वाली है। सबकी प्राथमिकताएं बदलने वाली हैं।

अत: बजट का पुनर्गठन किया जाए, बजाये वित्त वर्ष के अंत में न प्रयोग किये गए राशि को सरकार को वापस कर, उससे पहले जिस विभाग को उस फंड की सबसे अधिक जरूरत है। जैसे कि स्वास्थ्य में अधिक बजट आवंटित हो और जिस मंत्रालय या विभाग का खर्च इस कोरोना के कारण सिकुड़ गया हो वहां के लिये आवंटित बजट को निरस्त कर उसे जरूरतमंद विभाग को दिया जाय। इस प्रकार सभी बजट मदों का निरीक्षण कर इसका पुनर्गठन किया जाय ताकि इस लड़ाई से लडऩे के लिये सरकार के पास कर संग्रह नगण्य होने की दशा में वित्त का कुछ मद आ सके।

सरकार को कुछ लोग लिकर पर बिक्री की छूट देकर राजस्व संग्रह के लिए बोल रहे हैं उन्हें यह समझ लेना चाहिए कि इस कदम का सिर्फ आर्थिक प्रभाव ही नहीं सामाजिक प्रभाव भी हैं। अत: लिकर पर कोरोना सेस 100 प्रतिशत लगा, इसे नियंत्रित रूप में आधार लिंक कोटे के तहत सिर्फ एडवांस आर्डर या ऑनलाइन आर्डर के द्वारा बेंचा जाना चाहिए, जिससे राजस्व संग्रह के साथ सोशल डिस्टेंसिंग और अत्यधिक उपभोग से होने वाले सामाजिक अपराध, पारिवारिक कलह और स्वास्थ्य खतरों से भी लोग बच सकें।

इसके अलावा सरकार सबसे अधिक परेशान इसलिए है कि उसने आयकर जीएसटी सबके डेट बढ़ा दिए हैं, टीडीएस की दर भी कम कर दी है। सौदों की साइज भी कम हो गई है। अत: सरकार का राजस्व संग्रह नहीं के बराबर हो गया। बजट में अनुमानित कर की अपेक्षा, अत: इसके लिय सरकार को एडवांस आयकर एवं जीएसटी की एक टैक्स वैलेट स्कीम प्रोत्साहन रूप में लानी चाहिए, जिसके तहत यह लाभ देना चाहिए कि इस संकट के समय लडऩे के लिए जो कोई आयकर या जीएसटी इस वैलेट में देगा उसे इसका क्रेडिट आगे आने वाले अवधियों में चरणबद्ध तरीके से उसके उस कर विशेष के भुगतान में दी जाएगी और यदि किसी ने अपनी भविष्य की कर देयता से ज्यादा टैक्स का भुगतान इस टैक्स वैलेट में कर दिया है तो उसे स्वेच्छा से इस अधिक भुगतान की गई राशि को सरकारी बांड में बदलने का विकल्प देना चाहिए।

सरकार यदि यह विकल्प और टैक्स वैलेट प्रोत्साहन योजना लाती है तो बहुत सी बड़ी कंपनियां जिन्हें कुछ देश के लिए करने के लिए इच्छा है या कॅश रिच हैं, वह इस योजना को अपना सकती हैं, क्योंकि एक तो टैक्स का टैक्स पेमेंट हो जायेगा और देश की सेवा भी हो जायेगी, सरकार चाहे तो जब तक इस वैलेट में पड़ी राशि पर टैक्स पेमेंट या बांड परिवर्तन विकल्प का समायोजन नहीं होता है प्रोत्साहन के रूप में कुछ ब्याज भी दे सकती ताकि लोग करेंट, फिक्स्ड डिपॉजिट या सेविंग की जगह इच्छित राशि को इस वैलेट में रखने के लिए प्रोत्साहित हों। यहां सरकार को करना क्या है, उसे बस इस टैक्स भुगतान को प्री पुल करना है। पोस्टपोन की जगह और इसे प्रोत्साहन योजना से जोड़ देना है। आय का यह एडवांस संग्रह सरकार को आपदा के लिए ऋण लेने और उसके ब्याज के दबाब से भी मुक्त करेगा, और जो थोड़ा बहुत ब्याज देगा भी वह डीबीटी की तरह सीधे पब्लिक को ही मिलेगा। यह योजना केंद्र सरकार अपने सरकारी के लिए और राज्य सरकार अपने अन्य करों की लिए भी ला सकती है।

सरकार ऐसे मुश्किल हालत और असामान्य परिस्थितियों में पुन: छुपाये हुए आय, बेनामी संपत्ति या काले धन की स्वैच्छिक घोषणा की स्कीम ला सकती है जो उसने कुछ वर्ष पूर्व लाया था और पचास प्रतिशत टैक्स के भुगतान के रूप में बड़ी मात्रा में टैक्स का संग्रह कर सकती है, चूंकि यह असामान्य हालात हैं अत: सरकार को ऐसे असामान्य और विशेष निर्णय और आउट ऑफ द बॉक्स जाकर सोचना और लेना चाहिए।

स्वास्थ्य बजट पर पडऩे वाले दबाब को देखते हुए सरकार चाहे तो स्वास्थ्य बजट को टैक्स विवेकाधिकार योजना के तहत डायरेक्ट फंडिंग की भी योजना ला सकती है, जिसके तहत नागरिक, कंपनियां या फर्में डायरेक्ट स्वास्थ्य बजट अकाउंट में टैक्स का भुगतान करें और यदि इस अकाउंट में बजट से ज्यादा पैसे आ जाते हैं तो सरकार का विवेकाधिकार लागू हो जाए। चूंकि भारत का मूल चरित्र लोकोपकार का है। अत: चाहे टैक्स की उपरोक्त वैलेट स्कीम हो या स्वास्थ्य बजट को डायरेक्ट टैक्स फंडिंग की योजना हो जनता हाथों हाथ लेगी और हां इस स्वास्थ्य बजट के डायरेक्ट टैक्स फंडिंग टैक्स विवेकाधिकार स्कीम योजना के तहत आये राशि को आयकर की धारा 80 सी के तहत नहीं सीधे टैक्स पेमेंट ही मान लेना चाहिए, क्योंकि टैक्स का पेमेंट तो घूम कर इस कोरोना काल में स्वास्थ्य बजट में ही प्रयोग होने वाला था।

कोरोना से उपजे इस आर्थिक दिवालियेपन से लडऩे के लिए सरकार को इन उपायों के साथ-साथ आउट ऑफ द बॉक्स चिंतन करने के लिए अर्थ चिंतकों का एक मंडल बनाना चाहिए जिसमें ब्यूरोक्रेट के अतिरिक्त लोग हों जो सरकार को ब्यूरोक्रेट की सोच के अलावा वाले विकल्पों पर प्रकाश डाल सकें और सरकार को दोनों सोच का अध्ययन कर श्रेष्ठ निर्णय लेने का लाभ मिले।

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