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जीडीपी नहीं जीवन के आंकड़े अनमोल

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पंकज जायसवाल

जीवन है तो सब है। मृत्यु के बाद सब कुछ यहीं छोड़ के जाना है, चिता के साथ कुछ भी नहीं जाता है। जीवन है तो अर्थ का मूल्य है अन्यथा निर्मूल्य। अर्थशास्त्र का भी अंतिम उद्देश्य है सुख एवं संतुष्टि। सनातन अर्थशास्त्र का उद्देश्य पारिस्थितिकीय तंत्र सुखी रहे, मानव सुखी रहे, राज्य सुखी रहे, समाज सुखी रहे और परिवार सुखी रहे एवं पृथ्वी या ऐसे किसी अन्य ग्रह पर जहां जीवन है या इस जीवन वाले ग्रह जैसे की पृथ्वी पर जीवन निर्बाध गति से चलता रहे और ब्रह्माण्ड में खगोलीय संतुलन बना रहे।

ऐसे किसी भी समृद्धि सम्पन्नता या कार्य का कोई महत्व नहीं है यदि वह ग्रह पर जीवन को सुरक्षित न रख पाए। इसलिये जो सबसे बड़ी पूंजी है वह है जीवन, जीवन है तो अर्थ का मोल है, सारे व्यापार, उद्योग एवं राज्य है, पृथ्वी का आस्तित्व है, जीवन नहीं है तो कुछ भी नहीं है। अर्थशास्त्र वहीं आकर खत्म हो जाता है जहां इसके कारण किसी व्यक्ति का, मानव मात्र का, पृथ्वी का, ब्रह्माण्ड का, इसके खगोलीय संतुलन का आस्तित्व खतरे में आ जाये।

सनातन अर्थशास्त्र ऐसे किसी भी विकास को अपनी श्रेणी में शामिल नहीं करता। सनातन अर्थशास्त्र का सूत्र वाक्य ही सनातन है अर्थात नश्वर कभी न समाप्त होने वाला। ऐसा कोई भी कार्य उद्यम या व्यापार जो पारिस्थितिकीय तंत्र, मानव, राज्य, समाज, परिवार, पृथ्वी या ऐसे किसी अन्य ग्रह पर जहां जीवन है कि खुशी के लिए उसकी नश्वरता और उसकी निरंतरता की गति बरकरार रखने के लिए किया जाय वह सनातन अर्थशास्त्र के दायरे में आता है।

एक उदाहरण बताता हूं, मेरे एक मित्र थे, उनकी विकास की गति बहुत तेज थी और लगातार विकास करते करते और विकास करने की धुन में वो अपने खुद के और अपने परिवार दोनों को पर्याप्त समय नहीं दे पाते थे और एक दिन पता चला कि उन्हें कैंसर की बीमारी हो गई है और इसके पता चलने के तीन माह के अन्दर उनकी मृत्यु हो गई। इस कहानी के द्वारा मैं यह बताना चाहता हूं कि विकास जरुरी है, लेकिन उससे ज्यादा जरुरी है विकास की गति क्या हो। इसको समझना, लगातार तेज गति से दौडऩे से हार्ट अटैक भी आ सकता है, विकास की दौड़ यदि छोटी हो तो बहुत तेज दौडऩा न्यायसंगत हो सकता है, लेकिन यदि विकास की दौड़ लम्बी हो तो बीच बीच में आराम और सांस लेने के लिए रुकना भी पड़ सकता है, कभी कभी धीमा भी चलना पड़ता है। दौड़ाने की जगह तब जाकर आब विकास की दौड़ यदि मैराथन हो तो जीत सकते हैं।

ठीक यही नियम देश के विकास की दौड़ पर लागू होती है, ठीक है यह जरुरी है कि देश विकास करे लेकिन यह जनमानस की सहूलियत और अनुकूलन के हिसाब से होना चाहिए। कई बार ऐसा लगे कि जनमानस कुछ निर्णयों से परेशान हो रहा है या उसका सांस फूल रहा है तो कुछ समय के लिए रूक कर ठहर कर माहौल के अध्ययन के लिए ही सही विकास के आगे सरवाईवल को प्राथमिक कर देना चाहिए।

आज चारों ओर कोरोना का कहर जारी है। यह देश की अर्थव्यवस्था और स्वास्थ्य दोनों को चोट पहुंचा रही है, सरकार को और जन को इन दोनों के बीच चुनाव करना पड़ेगा कि इन दोनों के बीच सबसे कीमती क्या है? फिर उसे प्राथमिकता में लेना पड़ेगा, लाजिमी है कि जीवन सबसे कीमती है, अनमोल है, जीवन ही नहीं बचेगा तो विकास को प्राप्त कर क्या करेंगे।

आज चारों तरफ आलोचना हो रही है। जीडीपी के गिरने को लेकर, लेकिन यह तो प्रत्याशित और स्वाभाविक था और वैश्विक भी होगा, जब सब कुछ बंद रहेगा तो माल और सेवा में सौदे कहां से होंगे और जब नहीं होंगे तो जीडीपी के आंकड़े तो गिरेंगे ही न, इसलिए जीडीपी के गिरने से चिंतित होने की जरुरत नहीं है, क्योंकि अभी घर बचाने से ज्यादे जरुरी जीवन बचाना है। जब 300 केस थे तो लॉकडाउन लग गया और आज जब 36 लाख से ज्यादा केस हैं तो लॉकडाउन की आज सर्वाधिक जरुरत है, लोग अब इस बीमारी को समझ चुके हैं मजदूर अपनी-अपनी जगह सेटल हो चुके हैं अब लगता है कि व्यवस्थित और नियोजित लॉकडाउन एक बार लगा कर इस चेन को तोडऩा चाहिए।

इस कोरोना काल में एक चीज और दुखदाई है वह है कोरोना की चेन तोडऩे के चक्कर में मेडिकल चेन ब्रेक हो गई है और लोगों की अन्य बीमारियों में ट्रीटमेंट टाइम से नहीं मिलने और अस्पताल में जगह न मिलने से मृत्यु हो रही है। सरकार को देखना चाहिये कि यह मेडिकल चेन ब्रेक न हो वह इसकी व्यवस्था करे और फोकस जल्दी से और तुरंत परिणाम वाले टेस्टिंग जांच को बढ़ावा दे, जब तक वैक्सीन नहीं आ जाता है।

साथ में सरकार को बजट की समस्या यदि आती है तो घोषित बजट मदों को पुनर्गठित कर दोबारा बजट बनाये ताकि अन्य मदों के खर्च को कम कर उस मद को स्वास्थ्य एवं जनता के ऋण किश्त की राहत में लगाये अन्यथा सितम्बर से जनता को कोरोना से तगड़ी चोट लगने वाली है। चूंकि कोरोना से लड़ाई के लिए अब राज्य सरकार को जिम्मेदार बनाया गया है। अत: राज्यों को बकाये जीएसटी की राशि को इसे देना चाहिए, ताकि वह इसे कोरोना की लड़ाई में लगा सके और चंूकि जनता को भी आत्मनिर्भर बनाने की अपील की गई है तो उसे भी सरकार को इस लड़ाई में लडऩे के लिए सक्षम और आत्मनिर्भर बनने लायक बनाना पड़ेगा।

कोरोना का डाटा जिस तेजी से बढ़ रहा है लग रहा है कि इस कहर में हम दुनिया में दूसरे नम्बर पर आ जायेंगे, जबकि अन्य देशों के मुकाबले यहां पर दिए गए वित्तीय पैकेज उतने प्रभावी नहीं थे। बैंकों की मनमानी चल ही रही थी, रिजर्व बैंक ने अपने आदेश को प्रभावी रूप में लागू करने में सफल नहीं रहा था और उसके मोरेटेरियम की अवधि भी 31 अगस्त को खत्म हो रही है। मतलब सितम्बर में आय तो कोई खास बढ़ी नहीं। मास्क-सेनिटाइजर और अन्य इम्यून सिस्टम से सम्बंधित खर्चे बढ़ गए, बिक्री व्यापार लगभग नगण्य है, हर व्यक्ति हानि में चल रहा है यहां तक कि सरकार भी हानि में चल रही है, ऐसे में यदि बैंकों के आय मीटर पर लगाम नहीं लगाई गई तो सितम्बर का महीना भारत के लिए दुखदाई होगा और अगर किश्त में राहत नहीं मिली तो हो सकता है कि जनता त्राहिमाम-त्राहिमाम करे।

अत: सरकार को अपनी प्राथमिकता सूची में अर्थव्यवस्था से ऊपर स्वास्थ्य और जनता की वित्तीय परेशानी देखनी पड़ेगी और उसके बाद अर्थव्यवस्था, जीडीपी के गिरते आंकड़े। सरकार को आर्थिक आंकड़े से चिंता की उतनी जरुरत नहीं है, जितना कोरोना के बढ़ते आंकड़े से चिंतित होने की जरुरत है, क्योंकि जान है तो जहान है और 2020 का शुद्ध लाभ जीवन है और कुछ नहीं।

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